भोपाल, 27 अगस्त।
मध्यप्रदेश में 1315 नालों से रोज 637 एमएलडी सीवेज का बिना शोधन नदियों में पहुंचना सिर्फ पर्यावरणीय लापरवाही नहीं, बल्कि भविष्य के जल संकट की गंभीर चेतावनी है।
413 नगरीय निकायों में 352 के पास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं होना बताता है कि शहरों का विस्तार तो हुआ, लेकिन बुनियादी स्वच्छता व्यवस्था उस गति से विकसित नहीं हुई।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि नर्मदा, क्षिप्रा, चंबल और बेतवा जैसी जीवनदायिनी नदियां इस प्रदूषण का बोझ उठा रही हैं। इन नदियों पर करोड़ों लोगों की पेयजल और कृषि जरूरतें निर्भर हैं।
राजधानी भोपाल में भी नालों के जरिए सीवेज के बड़े तालाब तक पहुंचने की स्थिति सामने आना बताता है कि समस्या केवल छोटे शहरों की नहीं है।
विडंबना यह भी है कि 61 नगरीय निकायों में एसटीपी मौजूद हैं, लेकिन करीब 12.67 लाख घर सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं।
यानी सरकार ने संयंत्र बनाए, लेकिन उन्हें पर्याप्त सीवेज ही नहीं मिल रहा और दूसरी ओर घरों का गंदा पानी नालों में जा रहा है। यह योजना नहीं, अधूरी व्यवस्था का उदाहरण है।
ठोस कचरे की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। 110 निकायों में लाखों टन पुराना कचरा पड़ा है। बरसात में इसका प्रदूषित पानी भूजल और नदियों तक पहुंचता है।
ऐसे में जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाया जाए।
अब सरकार को नई घोषणाओं के बजाय समयबद्ध कार्रवाई करनी होगी। प्रत्येक निकाय में सीवर नेटवर्क, घर-घर कनेक्शन और एसटीपी की क्षमता के अनुसार संचालन सुनिश्चित करना होगा।
नालों की रियल टाइम निगरानी, प्रदूषण फैलाने वालों पर दंड और नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग जरूरी है। नदी बचाने के नाम पर केवल सफाई अभियान चलाने से काम नहीं चलेगा।
जब तक नालों का मुंह नदियों से बंद नहीं होगा, जल सुरक्षा का हर दावा अधूरा रहेगा।














