भोपाल, 27 अगस्त।
मध्यप्रदेश में सत्ता में वापसी के बाद अब भाजपा भविष्य की रणनीति पर मंथन कर रही है। पार्टी के भीतर सबसे बड़ी चर्चा उम्रदराज नेताओं और लंबे समय से सक्रिय राजनीति में रहे चेहरों की भूमिका को लेकर है।
सूत्रों का कहना है कि दिल्ली से मिले संकेतों के बाद प्रदेश में वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में शामिल करने और उनके स्थान पर युवा चेहरों को आगे लाने की रणनीति पर विचार हो रहा है, ताकि जेन जी यानी युवा मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत की जा सके। ओरछा में हुई कार्यसमिति बैठक के बाद से कई वरिष्ठ नेताओं की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, नौ बार के विधायक गोपाल भार्गव जैसे नेताओं की भूमिका को लेकर भी मंथन चल रहा है। कहा जा रहा है कि प्रदेश से लेकर दिल्ली तक नेतृत्व ने पार्टी को नए सिरे से तैयार करने का मन बनाया है।
इसमें ऐसे नेताओं के विकल्प तलाशने पर विचार हो रहा है, जिनकी उम्र अधिक हो चुकी है, चुनावी प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा है या जिनका प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कमजोर हुआ है। फिलहाल पार्टी का फोकस प्रदेश कार्यसमिति की आगामी बैठक पर है।
अंदरूनी सर्वे ने बढ़ाई टेंशन
भाजपा के लिए वरिष्ठ नेताओं के विकल्प की तलाश तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि प्रदेश स्तर पर भी सर्वे कराया गया है।
इसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि किन नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजा जाए और किन्हें सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर किया जाए। दिल्ली के संकेतों के बाद ऐसे नेताओं के विकल्प तलाशे जा रहे हैं, जिन्हें पार्टी की मुख्यधारा से जोड़े रखते हुए मैदान में युवा चेहरों को उतारा जा सके।
इन नेताओं पर नजर
गोपाल भार्गव, विजय शाह, नरेंद्र सिंह तोमर सहित एक दर्जन से अधिक बड़े नेताओं की भूमिका को लेकर पार्टी में चर्चा है। रणनीति यह बताई जा रही है कि वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का उपयोग करते हुए उनकी जगह नई पीढ़ी को आगे बढ़ाया जाए।
गोपाल भार्गव नौ बार के विधायक हैं, लेकिन पार्टी अब उनके विकल्प पर भी विचार कर रही है। कहा जा रहा है कि यदि उनके स्थान पर किसी दूसरे को टिकट दिया जाता है तो सागर जिले की दो से तीन सीटों पर इसका असर पड़ सकता है। यही वजह है कि उनके मामले में फैसला आसान नहीं माना जा रहा है।
आदिवासी बाहुल्य विधानसभा सीटों पर खासा दखल रखने वाले कुंवर विजय शाह को लेकर भी पार्टी के सामने अलग तरह की चुनौती है। उन्हें सरकार की टीम से अलग करना आसान नहीं होगा, क्योंकि पार्टी को मालूम है कि शाह का ठोस विकल्प तैयार किए बिना ऐसा फैसला नुकसान पहुंचा सकता है। उनके अलावा सत्ता में सक्रिय दूसरे आदिवासी नेताओं में फिलहाल शाह जैसा प्रभाव नहीं माना जाता।
नरेन्द सिंह तोमर का अलग प्रभाव
नरेन्द सिंह तोमर को मूलधारा में सक्रिय रखते हुए पार्टी कई सीटों पर लाभ ले सकती है। भिंड में भाजपा के लिए चौधरी परिवार प्रभावी माना जाता रहा है।
तोमर भी पार्टी के कद्दावर नेताओं में शुमार हैं। केंद्र में बड़े कद वाले मंत्री रहे तोमर का प्रभाव चंबल-ग्वालियर में तो है ही, उनके समर्थक राज्य के दूसरे अंचलों में भी हैं। ऐसे में उनकी वरिष्ठता को यदि पर्याप्त महत्व नहीं मिलता है तो पार्टी को राजनीतिक नुकसान की आशंका रहेगी।
मुरैना जिले में गुर्जर नेता के तौर पर जनता के बीच पकड़ रखने वाले पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह को लेकर भी मंथन की बात कही जा रही है।
जेन जी फैक्टर से निपटने की रणनीति
भाजपा की नई रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा जेन जी को साधना है। पार्टी मान रही है कि पुराने चेहरों से युवा मतदाताओं का जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा है।
इसलिए हर विधानसभा में एक ऐसा युवा चेहरा तैयार करने की रणनीति पर काम हो रहा है, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हो और कॉलेज के युवाओं से सीधे संवाद कर सके।
योजना यह बताई जा रही है कि बुजुर्ग नेताओं को मंच से पूरी तरह हटाया नहीं जाएगा। उन्हें मार्गदर्शक मंडल में रखकर सम्मान दिया जाएगा और संगठन में उनके अनुभव का उपयोग किया जाएगा, लेकिन टिकट और मंत्री पद जैसे कार्यकारी पदों पर युवाओं को आगे लाया जाएगा।
इसका उद्देश्य 2028 के विधानसभा चुनाव तक भाजपा को नए रूप में प्रस्तुत करना है।
भाजपाई बने कांग्रेसियों ने बिगाड़ा खेल
इधर जानकारी के अनुसार, भाजपा में विंध्य, बुंदेलखंड और महाकौशल के कुछ वरिष्ठ नेताओं की पूछ-परख घटने की चर्चा है। इनमें से कुछ नेता फिलहाल भाजपा से बाहर हैं और उन्हें वापस लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
ऐसे नेताओं को भी संतुष्ट करने की कोशिश है, जो लंबे समय से संगठन में अपनी उपेक्षा की शिकायत करते रहे हैं। इनमें रघुनंदन शर्मा और वरिष्ठ विधायक अजय विश्नोई जैसे नेताओं के नाम लिए जा रहे हैं।
राज्यसभा सांसद रहे अजय प्रताप सिंह से भी संपर्क किए जाने की चर्चा है। सिंह से भाजपा के कुछ नेता लगातार संपर्क बनाए हुए हैं।
कई क्षेत्रों में दूसरी लाइन प्रभावहीन होना भी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। जिन क्षेत्रों में बदलाव की तैयारी है, वहां दूसरी पंक्ति का कोई ऐसा युवा नेता फिलहाल नजर नहीं आ रहा, जो पुराने चेहरे का प्रभावी विकल्प बन सके।
ऐसे में पार्टी के सामने बदलाव और मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
दरअसल, कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं के भाजपा में आने से पुराने भाजपा नेताओं की राजनीतिक दूसरी लाइन कमजोर हुई है।
इससे पुराने नेता और उनके समर्थक नाराज बताए जाते हैं। पार्टी ने इन नेताओं को संगठन, विंग और मंडल स्तर पर एडजस्ट करने की कोशिश की, लेकिन बाहर से आए नेताओं के प्रभाव के कारण कई जगह उनके लिए रास्ता सीमित हो गया।
यही स्थिति अब भाजपा के सामने नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के साथ पुराने नेताओं को साधे रखने की चुनौती खड़ी कर रही है।















