भोपाल, 27 अगस्त।
एक तरफ केंद्र सरकार और रेलवे मंत्रालय लगातार दावा करता है कि यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं दी जा रही हैं, स्टेशनों को एयरपोर्ट जैसा बनाया जा रहा है और खाने की गुणवत्ता पर जीरो टॉलरेंस है।
दूसरी तरफ भोपाल रेलवे स्टेशन के आईआरसीटीसी फूड प्लाजा की हकीकत इस दावे की हवा निकाल रही है। यहां यात्रियों को जो पैक्ड भोजन दिया जा रहा है, उसकी चिट पर सिर्फ एक्सपायरी लिखी है, निर्माण और पैकिंग की तारीख गायब है।
मतलब यात्री जो खाना खा रहा है, वह कितना पुराना है, उसे पता ही नहीं है।
स्टेशन और ट्रेनों में सफर के दौरान यात्री अक्सर खाने के लिए रेलवे के फूड स्टॉल और फूड प्लाजा पर निर्भर रहते हैं, लेकिन खाने की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
भोपाल स्टेशन पर मौजूद फूड प्लाजा पर पैक्ड भोजन की चिट पर सिर्फ एक्सपायरी लिखी मिली, जबकि खाना कब बनाया और कब पैक किया गया, इसकी जानकारी नहीं थी।
जब इस संबंध में फूड प्लाजा के स्टाफ से बात की गई तो उन्होंने बताया कि खाना सुबह ही तैयार किया गया था।
हालांकि, जब पैकेट पर भोजन तैयार होने के समय की जानकारी दर्ज नहीं होने को लेकर सवाल किया गया तो स्टाफ ने कहा कि इस संबंध में आगे चर्चा करेंगे। यह जवाब बताता है कि जिम्मेदारी से कैसे बचा जा रहा है।
45 रुपए का आमलेट सैंडविच खरीदा। इसमें न तो मिर्च थी और न ही नमक।
इसके अलावा पैकेट पर कीमत के अलावा उत्पाद से जुड़ी कोई अन्य जरूरी जानकारी भी उपलब्ध नहीं थी। इस तरह से यह हमारे साथ धोखा है।
खाने के पैकेट पर खाना कब बना और कब इसे पैक किया गया, इसकी जानकारी तो होनी ही चाहिए। यात्री ने लंच पैक कराया, लेकिन उस पर यह जानकारी नहीं दी गई थी कि खाना कब तैयार किया गया और कब पैक किया गया।
ऐसे में यदि कोई यात्री खाना पैक कराकर यात्रा के दौरान ले जाता है और उसे खाने में देरी हो जाती है तो उसके लिए यह पता लगाना मुश्किल होगा कि खाना खाने योग्य है या खराब हो चुका है। यह जानकारी तो होनी ही चाहिए।
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के अनुसार किसी भी पैक्ड फूड पर निर्माण तिथि, पैकिंग समय, कीमत और बैच नंबर लिखना अनिवार्य है।
एक्सपायरी डेट से अकेले काम नहीं चलता, क्योंकि निर्माण तिथि के बिना यह पता नहीं चलता कि खाना कितने घंटे पहले बना है।
गर्मी के मौसम में पनीर, चावल और अंडे से बना खाना जल्दी खराब होता है। ऐसे में यात्री की सेहत से खिलवाड़ हो रहा है।
रेलवे खुद कहता है कि उसका लक्ष्य शिकायतों को शून्य करना है। स्टेशन या ट्रेन में वेंडर की लापरवाही अथवा अवैध वसूली पर 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाता है।
इसके अलावा उसकी रिस्पांस टीम भी सक्रिय है, जो स्पॉट पर पहुंचकर काम करती है। लेकिन भोपाल में तो फूड प्लाजा खुद ही नियम तोड़ रहा है, तो वेंडर पर कार्रवाई कौन करेगा?
ट्रेन और रेलवे स्टेशन पर इस तरह का पैकेज्ड फूड दिया जाता है, जिस पर निर्माण तारीख दर्ज नहीं होती। यह लापरवाही छोटी नहीं है।
दूषित पानी से बच्चे सबसे ज्यादा बीमार हो रहे हैं, अस्पताल में वायरल इंफेक्शन के केस बढ़े हैं।
ऐसे में यदि खाने की गुणवत्ता खराब होगी तो संक्रमण और बढ़ेगा। यात्री को उल्टी-दस्त और फूड पॉइजनिंग का खतरा है।
हर पैकेट पर निर्माण व पैकिंग की तारीख और समय स्पष्ट हो, कीमत व जरूरी जानकारी दर्ज हो, भोजन की गुणवत्ता जांच हो, हेल्पलाइन नंबर और क्यूआर कोड उपलब्ध हो, हर खरीद पर बिल दिया जाए, खराब भोजन की सैंपल जांच हो और लापरवाह वेंडरों पर कार्रवाई हो।
रेलवे को समझना होगा कि चमकते स्टेशन और बुलेट ट्रेन के दावों से पहले यात्री को साफ, सुरक्षित और ताजा खाना चाहिए।
एक्सपायरी लिखकर खानापूर्ति नहीं चलेगी। यात्री को यह जानने का हक है कि वह जो खा रहा है, वह कब बना है।
वरना बेहतर सुविधा का दावा सिर्फ कागजों पर ही रहेगा।















