भोपाल, 29 अगस्त।
आगामी गणेश उत्सव को देखते हुए राजधानी भोपाल के विभिन्न स्थानों पर मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में भगवान श्री गणेश की सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण किया जा रहा है। शहर में सैकड़ों मूर्तिकार अपनी कार्यशालाओं में कुछ प्रतिमाएं बनाने की शुरुआत कर रहे हैं, तो कई मूर्तिकार प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। शहर के टीटी नगर, कलार, अशोका गार्डन, 11 मील, भानपुर और बैरागढ़ सहित विभिन्न स्थानों पर स्थानीय मूर्तिकारों के साथ नागपुर और कोलकाता से आए मूर्तिकार भी बप्पा की प्रतिमाएं बना रहे हैं। शिवाजी कॉलोनी के मूर्तिकार संतोष प्रजापति ने बताया कि शिवाजी नगर में दर्जनभर से अधिक व्यापारियों द्वारा मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। सभी व्यापारी पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं बना रहे हैं और इसी सोच को घर-घर तक पहुंचा रहे हैं।
मांग ज्यादा, बन रही जूट की मूर्तियां - कोलकाता, नागपुर और स्थानीय मूर्तिकार प्रतिमाएं बना रहे हैं। बुकिंग के लिए ग्राहक पहुंच रहे हैं। शिवाजी नगर में दर्जनभर से अधिक व्यापारियों द्वारा मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। प्रदूषण से बचने के लिए मूर्तियों में रंग-रोगन के लिए ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग हो रहा है।
पहले जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों की मांग अधिक थी, वहीं अब लोगों में थीम आधारित मूर्तियों का प्रचलन बढ़ा है। ग्राहक थीम के आधार पर मूर्ति बनवाते हैं, जिस पर मूर्तिकार कुछ बुकिंग एडवांस जमा करके थीम आधारित मूर्ति बनाने का कार्य भी करते हैं। किसी भी प्रतिमा को बनाने के लिए प्राकृतिक वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें लकड़ी, पेरा, भूसा, शुद्ध गोबर, तेपोसिया आटा और चिकनी मिट्टी शामिल है। अलग-अलग राज्यों से मिट्टी मंगाकर ऑर्गेनिक कलर और कपड़ों से सजावट की जाती है। शास्त्रों के अनुकूल हाथ से पाश, अंकुश, मोदक और अभय मुद्रा में मूर्ति का निर्माण किया जाता है। वहीं, मूर्तिकारों ने बताया कि अब लोगों में थीम आधारित मूर्तियों का प्रचलन बढ़ा है, जिसके चलते ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार थीम आधारित मूर्तियां बनवा रहे हैं।
प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों से नुकसान - अन्य जिलों में भी भेजी जाती हैं मूर्तियां। शिवाजी नगर स्थित जय दुर्गा मां वैष्णो कलकत्ता मूर्ति कला केंद्र के मूर्तिकार ने बताया कि कार्यशाला में तीन से चार कारीगर काम करते हैं। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियां पानी में घुलती नहीं हैं और तालाब व नदी में जाकर पानी को दूषित करती हैं। इससे जलीय जीवों को नुकसान होता है और कई दिनों तक पानी में केमिकल बना रहता है। जबकि मिट्टी और जूट से बनी मूर्ति कुछ घंटों में पानी में घुल जाती है और मिट्टी बनकर पर्यावरण में मिल जाती है। इसलिए अब जागरूक नागरिक इको फ्रेंडली मूर्तियों की ही मांग कर रहे हैं।
सीजन में होता है मुनाफा - एक मूर्तिकार ने बताया कि वह 25 साल से मूर्ति बनाने का काम कर रहा है। 25 दिनों में 20 से 25 मूर्तियां बना लेता है, लेकिन सीजन के समय मूर्ति बनाने में अच्छा मुनाफा हो जाता है और सालभर की चिंता खत्म हो जाती है। मूर्तिकार दिनेश प्रजापति का कहना है कि वह 10 साल से मूर्ति बनाने का काम कर रहे हैं। तीन महीने मूर्ति बनाने के लिए भोपाल आए हैं। मूर्ति बनाने की कार्यशैली दोस्तों के साथ कोलकाता के डायमंड हार्बर के मूर्तिकारों से सीखी थी। अब मूर्ति बनाने में हजार रुपये रोज मिल जाते हैं।
मूर्तिकारों का कहना है कि यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी है। जब हम ग्राहक को बताते हैं कि यह मूर्ति गोबर, भूसे और जूट से बनी है और इसमें केमिकल रंग नहीं है, तो लोग खुश होते हैं और बच्चों को भी समझाते हैं कि बप्पा को घर लाना है तो प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाना है।
घर-घर पहुंच रहा सकारात्मक संदेश - त्योहारों पर पर्यावरण की जागरूकता अब घर-घर पहुंच रही है। पहले लोग बड़ी और चमकदार मूर्ति की मांग करते थे, लेकिन अब छोटी और इको फ्रेंडली मूर्तियों की मांग बढ़ी है। लोग समझने लगे हैं कि भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि भावना में है और यदि मूर्ति पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी तो पूजा अधूरी रहेगी।
भोपाल नगर निगम और जिला प्रशासन भी इको फ्रेंडली मूर्तियों को बढ़ावा दे रहा है। कई स्थानों पर मिट्टी के गणेश वितरित किए जा रहे हैं और लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि विसर्जन भी कृत्रिम तालाबों में करें, ताकि बड़ी झीलों और नदियों को बचाया जा सके। यदि इसी तरह हर त्योहार पर पर्यावरण का संदेश दिया गया तो आने वाली पीढ़ी अधिक जागरूक होगी। गणेश उत्सव, दीपावली और होली सभी त्योहारों में अब पर्यावरण का ध्यान रखा जा रहा है। जूट और मिट्टी से बनी मूर्तियां केवल एक शुरुआत हैं। आगे चलकर हर घर में यह सोच पहुंचेगी कि त्योहार मनाना है तो प्रकृति को साथ लेकर चलना है।
मूर्तिकारों की यह पहल पूरे शहर के लिए प्रेरणा बन गई है। जहाँ एक ओर रोजगार मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण का बड़ा संदेश भी घर-घर पहुंच रहा है। बप्पा की यह यात्रा अब केवल आस्था की नहीं, बल्कि हरियाली और जागरूकता की भी यात्रा बन गई है।















