नई दिल्ली, 29 अगस्त।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत वोट है, लेकिन सबसे बड़ी कमजोरी भी वोट के प्रति उदासीनता है। निर्वाचन आयोग के ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में 18 से 26 साल के आयु वर्ग में 14.78 करोड़ युवा हैं, जिनमें 7.98 करोड़ पुरुष और 6.79 करोड़ महिलाएं हैं। यह वह वर्ग है जो सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय है, राय बनाने में सबसे तेज है, लेकिन बूथ तक पहुंचने में सबसे पीछे है। इसी खाई को पाटने के लिए आयोग ने जेन जी और जेन अल्फा तक पहुंचने का मेगा प्लान तैयार किया है।
योजना के तहत देश की 4123 विधानसभा सीटों में कक्षा 9 से 12 तक के स्कूलों और कॉलेजों में इलेक्टोरल लिटरेसी क्लब यानी ईएलसी 2.0 शुरू किए जाएंगे। हर विधानसभा में 10 क्लब के हिसाब से कुल 50 हजार क्लब होंगे। ये क्लब कोई औपचारिक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की लाइव लैब होंगे। यहाँ मॉक पोल होगा, चुनावी प्रक्रिया की रिहर्सल होगी, संविधान पर बहस होगी और वोट के अधिकार पर खुली चर्चा होगी। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2018 में शुरू हुए ईएलसी अभियान को अब पूरी तरह डिजिटल और एक्टिव मोड में बदला जा रहा है। पहले क्लब बने, फिर कागजों में सिमट गए। अब आयोग चाहता है कि ये क्लब लगातार सक्रिय रहें, इनका डिजिटल डैशबोर्ड हो और गतिविधियों की मॉनिटरिंग सीधे जिला निर्वाचन अधिकारी करें।
क्या स्कूल में लोकतंत्र पढ़ाया जा सकता है? जवाब है हाँ, लेकिन किताब से नहीं, अनुभव से। जब एक छात्र अपने स्कूल में ही मतदान अधिकारी बनेगा, मतपेटी संभालेगा और उंगली पर स्याही लगाएगा, तो उसके मन में वोट का मूल्य बैठेगा। वह जब घर जाकर अपने माता-पिता से पूछेगा कि आपने वोट दिया क्या, तो एक क्लब पूरे परिवार को जागरूक कर देगा। जेन अल्फा वह पीढ़ी है, जो 2010 के बाद जन्मी है और मोबाइल में ही दुनिया देखती है। इनके लिए लोकतंत्र का मतलब इंस्टाग्राम रील नहीं होना चाहिए। इन्हें समझना होगा कि लाइक और वोट में फर्क है। लाइक एक सेकंड का रिएक्शन है, वोट पाँच साल का भविष्य है। ईएलसी इसी फर्क को समझाने की पाठशाला बन सकते हैं।
हालांकि चुनौतियां भी बड़ी हैं। हमारे अधिकांश सरकारी स्कूलों में एक शिक्षक पर कई जिम्मेदारियां हैं। क्या वह अतिरिक्त रूप से ईएलसी चला पाएगा? क्या निजी स्कूल इस अभियान में ईमानदारी से जुड़ेंगे या इसे केवल फोटो सेशन बना देंगे? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस अभियान को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखा जा सकेगा? स्कूल को किसी भी दल का प्रचार केंद्र नहीं बनने देना होगा।
निर्वाचन आयोग ने वोटर को बूथ तक लाने के लिए कई प्रयोग किए हैं। सेलिब्रिटी को ब्रांड एंबेसडर बनाया, पोस्टर लगाए और गीत बनवाए, लेकिन सबसे स्थायी प्रयोग वही होता है, जो क्लासरूम से शुरू होता है। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले जेन जी और जेन अल्फा को तैयार करने की यह पहल केवल चुनाव सुधार नहीं है, यह लोकतंत्र के भविष्य में निवेश है।
इस अभियान को केवल आयोग का अभियान न समझा जाए। शिक्षा विभाग, शिक्षक, अभिभावक और छात्र सभी इसकी जिम्मेदारी लें। तभी स्कूल की यह छोटी-सी वोट की पाठशाला देश के बड़े लोकतंत्र को मजबूत कर पाएगी।














