अनूपपुर, 29 अगस्त।
आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव के प्रतीक कजलियां पर्व का जिलेभर में धूमधाम से आयोजन किया गया। महिलाओं और कन्याओं ने नदी, तालाब तथा सरोवरों में पहुंचकर परंपरा के अनुसार कजलियों का विसर्जन किया। इसके बाद वे कजलियां लेकर घर लौटीं और सबसे पहले परिवार के सदस्यों को भेंट कीं। बड़ों ने छोटों को आशीर्वाद दिया और बच्चों व युवाओं ने बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
भाद्रपद मास की प्रतिपदा को मनाए जाने वाले इस पर्व को भुजरिया पर्व भी कहा जाता है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाए जाने वाले इस पारंपरिक त्योहार में लोग एक-दूसरे को गेहूं की भुजरिया देकर खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हैं। यह पर्व लंबे समय से क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
परंपरा के अनुसार नागपंचमी के दूसरे दिन कई घरों में गेहूं और जौ के बीज मिट्टी में बोए जाते हैं। बांस के बर्तनों और टोकरियों में रखी मिट्टी में तैयार होने वाले इन पौधों को घर की महिलाएं और कन्याएं रक्षाबंधन तक नियमित रूप से पानी देती हैं। इसके बाद पर्व के दिन इन्हें लेकर नदी, तालाब और सरोवरों तक पहुंचा जाता है।
कजलियां पर्व को क्षेत्र में परीवा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक-दूसरे से मिलने, प्रेम बढ़ाने और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर माना जाता है। लोग अपने से बड़े लोगों को कजलियां देकर उनके चरण स्पर्श करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। सभी जाति और धर्मों के लोगों ने एक-दूसरे को कजलियां देकर शुभकामनाएं दीं तथा सामाजिक भाईचारे का संदेश दिया।
अनूपपुर नगर में विभिन्न नदी और सरोवरों पर पहुंचकर लोगों ने कजलियों का विसर्जन किया। इसके बाद एक-दूसरे को कजलियां भेंट कर पर्व की बधाई दी गई। कोतमा नगर में पंचायती मंदिर और पुरानी बस्ती से शाम को कजलियां का जुलूस निकाला गया। भजन-कीर्तन के साथ निकला जुलूस बस स्टैंड, पुरनिहा तालाब और मनेन्द्रगढ़ रोड स्थित केरहा तालाब पहुंचा, जहां कजलियों के विसर्जन के साथ इसका समापन हुआ।
शाम होते ही बच्चे, युवा और बुजुर्ग कजलियां लेकर एक-दूसरे के घर पहुंचे। लोगों ने गले मिलकर खुशियां बांटी और पर्व की शुभकामनाएं दीं। यह त्योहार लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने और पारंपरिक सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम बना।
कजलियां पर्व का कृषि से भी विशेष संबंध माना जाता है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन कन्याएं और महिलाएं दोपहर बाद तैयार होकर बांस की टोकरियां सिर पर रखकर समूह में नदी, तालाब और सरोवरों तक जाती हैं। वहां कजलियों के पौधों को जड़ से अलग कर टोकरी और मिट्टी का विसर्जन किया जाता है। पौधों के तनों को लोग एक-दूसरे को भेंट करते हैं।
बच्चे, बच्चियां और युवा कजलियां देकर बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं। किसान परिवार इन पौधों की स्थिति देखकर वर्ष की फसल का अनुमान भी लगाते हैं। बुजुर्गों द्वारा मिलने वाली कजलियों को बच्चों के कानों पर लगाने की परंपरा भी निभाई जाती है। दोपहर से शुरू हुआ यह पारंपरिक उत्सव देर रात तक चलता रहा।
ग्राम हर्री में भी कजलियां पर्व का भव्य आयोजन किया गया। बाल गणेश उत्सव समिति के नेतृत्व और ग्राम पंचायत की सरपंच संतोषी खैरवार के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। महिलाओं और ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पर्व मनाया और पूरे गांव में उत्सव का माहौल बना रहा।
आयोजन के दौरान प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश दिया गया। बाल गणेश उत्सव समिति के सदस्यों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समिति ने ग्रामीणों को पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि ऐसे पारंपरिक आयोजन संस्कृति और सामाजिक सद्भाव को मजबूत बनाते हैं। ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी से कार्यक्रम का उत्साह और बढ़ गया तथा समिति और ग्रामवासियों ने भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक एवं सामाजिक आयोजन जारी रखने का संकल्प लिया।















