भोपाल, 29 अगस्त।
मध्यप्रदेश पुलिस अब अपराध की जांच के पुराने तरीके को छोड़कर डिजिटल युग में प्रवेश कर रही है। अब किसी भी मामले की जांच-पड़ताल की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होने जा रही है। सीआईडी ब्रांच ने इस संबंध में भोपाल, इंदौर के पुलिस कमिश्नर, सभी जिलों और जीआरपी यूनिट के एसपी, एसटीएफ समेत अन्य इकाइयों को निर्देश जारी किए हैं। आदेश के मुताबिक अब पुलिस जांच का सारा काम सीसीटीएनएस और ई-साक्ष्य पोर्टल पर ऑनलाइन ही किया जाएगा। केस डायरी किसी भी एफआईआर का सबसे अहम दस्तावेज होती है और किसी मामले की सुनवाई में सहायता के लिए इसका उपयोग होता है। इसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके अलावा आरोपी या उसके वकील को भी कुछ विशेष मामलों को छोड़कर केस डायरी देखने का अधिकार नहीं होता।
फिलहाल यह पारंपरिक तरीका है। कई मामलों में सुनवाई के दौरान अदालत प्रॉसीक्यूटर के जरिए खुद या पुलिस को केस डायरी पेश करने का निर्देश देती है। इसके बाद पेशी पर संबंधित केस का जांच अधिकारी खुद मौजूद रहकर डायरी में लिखे तथ्यों के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देता है। हालांकि केस डायरी को न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया जाता। कोर्ट पेशी के बाद डायरी पुलिस को वापस कर देती है और यह कोर्ट फाइल का हिस्सा नहीं बनती। अभी एमपी में प्रचलित नियम के अनुसार केस डायरी मूल रूप में ही कोर्ट में पेश की जाती है।
अब नई व्यवस्था के तहत केस डायरी ई-साक्ष्य ऐप पर अपलोड की जाएगी और कोर्ट को डिजिटल एक्सेस दिया जाएगा। सिस्टम पर इसकी जानकारी दी जाएगी। ऐसे में जरूरत होने पर कोर्ट इसे ऑनलाइन देख सकेगी। इसके अलावा कई बार जज या सरकारी अधिवक्ता केस डायरी भी मांग लेते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए पीएनयू ने साफ कर दिया है कि कोर्ट या महाधिवक्ता ऑफिस में किसी मामले में हार्ड डिस्क भी दी जा सकती है। अब थाना प्रभारी या जांच अधिकारी सीसीटीएनएस पोर्टल से प्रिंटआउट निकाल सकेंगे। इसके अलावा दूसरा विकल्प यह है कि डायरी को पासवर्ड प्रोटेक्टेड पीडीएफ फाइल के रूप में हार्ड डिस्क में भी दिया जा सकता है। अब अनिवार्य कर दिया गया है कि केस डायरी या केस से जुड़े मामलों के जो भी प्रिंटआउट या सॉफ्ट कॉपी जारी की जाए, उस पर सीसीटीएनएस पोर्टल से प्रमाणित लिखा जाएगा और जांच अधिकारी के हस्ताक्षर व सील-मोहर लगाई जाएगी।
कोई अफसर मूल केस डायरी लेकर कोर्ट में पेश होता है, तो रिमांड, जमानत या सुनवाई के मामलों में जांच अधिकारी खुद मौजूद रहकर डायरी पेश करता है। जरूरत होने पर अदालत केस डायरी में लिखे तथ्यों के बारे में जांच अधिकारी से सवाल कर सकती है। हालांकि केस डायरी को न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया जाता। कोर्ट पेशी के बाद डायरी पुलिस को वापस कर देती है और यह कोर्ट फाइल का हिस्सा नहीं बनती।
यह बदलाव क्यों जरूरी है? अभी तक पुलिस थानों में केस डायरी हाथ से लिखी जाती थी और उसे कोर्ट तक पहुंचाने में काफी समय लगता था। कई बार डायरी गुम हो जाती थी या उसमें छेड़छाड़ का आरोप लगता था। डिजिटल होने से हर एंट्री का टाइम स्टैंप होगा और उसमें बदलाव करना आसान नहीं होगा। इससे जांच में पारदर्शिता आएगी और कोर्ट को भी सही समय पर जानकारी मिलेगी। सीनियर अधिकारी किसी भी केस की प्रगति को अपने दफ्तर में बैठकर देख सकेंगे। उन्हें थाने जाने की जरूरत नहीं होगी। इससे निगरानी बेहतर होगी और लापरवाह जांच अधिकारियों पर लगाम लगेगी।
ई-साक्ष्य एक मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल है, जिसे केंद्र सरकार ने नए आपराधिक कानूनों के तहत तैयार किया है। इसमें अपराध स्थल की वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी और गवाहों के बयान अपलोड किए जाते हैं। अब इसी ऐप में केस डायरी को भी जोड़ा जा रहा है। इससे एक ही जगह पर केस से जुड़ा सारा रिकॉर्ड मिल जाएगा। पुलिस अधिकारी मौके पर ही अपने मोबाइल से फोटो और वीडियो अपलोड कर सकेंगे और वही रिकॉर्ड कोर्ट में साक्ष्य के रूप में मान्य होगा। इससे फर्जी केस और झूठे सबूतों पर भी रोक लगेगी।
नई व्यवस्था से पुलिस का काम आसान होगा, लेकिन जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। अब हर जांच अधिकारी को सीसीटीएनएस पर रोज की कार्रवाई अपडेट करनी होगी। यदि वह ऐसा नहीं करता तो सीनियर अधिकारी को तुरंत पता चल जाएगा। वकीलों के लिए भी यह बदलाव अहम है। अभी तक उन्हें केस डायरी देखने के लिए कोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन डिजिटल व्यवस्था में कोर्ट चाहे तो उन्हें भी सीमित एक्सेस दे सकती है। हालांकि आरोपी को अभी भी केस डायरी देखने का अधिकार नहीं होगा, लेकिन ट्रायल के दौरान कोर्ट को पूरी डायरी ऑनलाइन मिल जाएगी।
डिजिटल व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौती डेटा सुरक्षा की है। केस डायरी में कई संवेदनशील जानकारियां होती हैं। यदि यह डेटा लीक हो गया तो अपराधी इसका फायदा उठा सकते हैं। इसलिए पुलिस ने पासवर्ड प्रोटेक्टेड पीडीएफ और डिजिटल सिग्नेचर की व्यवस्था की है। हर डायरी पर जांच अधिकारी की सील और हस्ताक्षर डिजिटल रूप में होंगे। ग्रामीण थानों में इंटरनेट और कंप्यूटर की कमी है। कई थानों में अभी भी नेटवर्क की समस्या है। सरकार को इसके लिए बजट बढ़ाना होगा और पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग भी देनी होगी।
यह कदम न्यायिक प्रक्रिया को तेज करेगा। अभी कई मामलों में केस डायरी समय पर नहीं पहुंचने से सुनवाई टल जाती है। डिजिटल होने से कोर्ट को तुरंत डायरी मिल जाएगी और तारीख पर तारीख का सिलसिला कम होगा। मध्यप्रदेश में यह प्रयोग सफल रहा तो इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है। इससे पुलिस जांच में भ्रष्टाचार कम होगा और आम लोगों को जल्दी न्याय मिलेगा। डिजिटल केस डायरी केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम है।















