इंदौर, 29 अगस्त।
इंदौर में औद्योगिक विकास के नए दौर की शुरुआत के समय 30 अगस्त 1966 को ऊर्जीकृत हुआ 132 केवी पोलोग्राउंड (चंबल) एक्स्ट्रा हाई टेंशन सबस्टेशन अब अपने 60 वर्ष पूरे करने जा रहा है। छह दशकों से यह सबस्टेशन इंदौर की बिजली व्यवस्था के साथ मालवा क्षेत्र के औद्योगिक और शहरी विस्तार का महत्वपूर्ण साक्षी बना हुआ है।
ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने शनिवार को बताया कि लंबे समय बाद भी यह सबस्टेशन इंदौर महानगर को विश्वसनीय विद्युत पारेषण उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभा रहा है। उनके अनुसार इंदौर की विकास यात्रा में इस केंद्र का विशेष योगदान रहा है। औद्योगिक विस्तार, आर्थिक गतिविधियों और शहर के बढ़ते स्वरूप को आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध कराने में इसने महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया है। कई पीढ़ियों के अभियंताओं और कर्मचारियों के प्रयासों से यह केंद्र छह दशक से प्रदेश की पारेषण व्यवस्था को मजबूत बनाए हुए है।
मालवा के औद्योगिक विकास को मिली ऊर्जा
मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी का यह केंद्र प्रदेश के पुराने एक्स्ट्रा हाई टेंशन सबस्टेशनों में शामिल है। इसे मालवा क्षेत्र का दूसरा और मध्य प्रदेश का पांचवां सबसे पुराना एक्स्ट्रा हाई टेंशन सबस्टेशन माना जाता है। वर्ष 1966 में शुरू हुए इस केंद्र ने इंदौर में बेहतर पारेषण व्यवस्था उपलब्ध कराकर औद्योगिक गतिविधियों और आर्थिक विकास को गति दी।
उस दौर में इंदौर सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था और इसे भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता था। चंबल सबस्टेशन से शहर की विभिन्न कपास मिलों को बिजली की आपूर्ति की जाती थी।
बीते छह दशकों में इंदौर एक बड़े व्यापारिक शहर से आधुनिक महानगर के रूप में विकसित हुआ है। औद्योगिक क्षेत्रों के साथ शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और आवासीय इलाकों का लगातार विस्तार हुआ। बिजली की बढ़ती जरूरत के बीच पोलोग्राउंड स्थित चंबल सबस्टेशन शहर के प्रमुख पारेषण केंद्रों में अपनी भूमिका निभाता रहा।
समय के साथ आधुनिक होता गया सबस्टेशन
बदलती जरूरतों के अनुरूप सबस्टेशन में लगे उपकरणों, नियंत्रण और सुरक्षा प्रणालियों के साथ पारेषण व्यवस्था को लगातार उन्नत किया गया। आधुनिक निगरानी और सुरक्षा तकनीकों को अपनाकर इस ऐतिहासिक केंद्र को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाता रहा है।
हाल के वर्षों में परिसर में 33 केवी फीडरों के क्रॉसिंग नेटवर्क को भूमिगत केबल प्रणाली में बदलने जैसे कार्य किए गए हैं। इससे बिजली व्यवस्था की सुरक्षा और विश्वसनीयता बढ़ी है। शुरुआत में 10 एमवीए क्षमता वाले इस सबस्टेशन में अब तीन पावर ट्रांसफार्मर हैं और इसकी कुल क्षमता 176 एमवीए हो चुकी है।
वर्ष 1966 में दो 33 केवी फीडरों के माध्यम से एक औद्योगिक और एक घरेलू क्षेत्र को बिजली आपूर्ति शुरू की गई थी। अब इस ऐतिहासिक सबस्टेशन से 33 केवी के 16 फीडर संचालित हो रहे हैं।
नियमित निगरानी और रखरखाव से कायम रही क्षमता
पूर्व के विद्युत मंडल और वर्तमान में एमपी ट्रांसको के अभियंताओं तथा तकनीकी कर्मचारियों द्वारा नियमित परीक्षण, समय-समय पर आवश्यक रखरखाव और सुरक्षा मानकों के पालन ने इस केंद्र को छह दशक बाद भी प्रभावी बनाए रखा है। बढ़ती बिजली मांग और तकनीकी बदलावों के अनुसार यहां लगातार सुधार और आधुनिकीकरण किया जाता रहा है।
मालवा का दूसरा और प्रदेश का पांचवां पुराना केंद्र
विद्युत कंपनी के अनुसार 132 केवी पोलोग्राउंड (चंबल) सबस्टेशन मालवा क्षेत्र का दूसरा और मध्य प्रदेश का पांचवां सबसे पुराना एक्स्ट्रा हाई टेंशन सबस्टेशन है। प्रदेश का सबसे पुराना 132 केवी ज्योति नगर सबस्टेशन उज्जैन में नवंबर 1960 में शुरू हुआ था।
इसके बाद फरवरी 1965 में कटनी, मार्च 1965 में मोतीझील, जून 1965 में सतना और फिर 30 अगस्त 1966 को इंदौर का पोलोग्राउंड (चंबल) सबस्टेशन ऊर्जीकृत किया गया था।
जापान से समुद्री मार्ग से पहुंचा था पहला ट्रांसफार्मर
पोलोग्राउंड (चंबल) सबस्टेशन में लगाया गया पहला 10 एमवीए क्षमता का पावर ट्रांसफार्मर जापान की हिताची कंपनी ने तैयार किया था। करीब 25 टन वजनी यह ट्रांसफार्मर समुद्री रास्ते से तत्कालीन बम्बई पहुंचा था और वहां से सड़क मार्ग से इंदौर लाया गया।
वर्ष 1962 में सबस्टेशन निर्माण को मंजूरी मिलने के बाद इस ट्रांसफार्मर का ऑर्डर दिया गया था। इसी दौरान मोरवा और इटारसी के सबस्टेशनों के लिए भी हिताची कंपनी से ट्रांसफार्मर मंगाए गए थे। 30 अगस्त 1966 को इसी ट्रांसफार्मर के माध्यम से इंदौर में अति उच्च दाब विद्युत आपूर्ति व्यवस्था के नए युग की शुरुआत हुई।
चंबल नाम के पीछे गांधी सागर का संबंध
इस सबस्टेशन को चंबल नाम दिए जाने के पीछे शुरुआती बिजली आपूर्ति का स्रोत था। प्रारंभिक समय में यहां बिजली चंबल नदी पर बने गांधी सागर बांध से प्राप्त होती थी। इसी कारण उस दौर में उज्जैन, इंदौर और भोपाल के 132 केवी सबस्टेशनों को भी चंबल नाम दिया गया था, क्योंकि इन क्षेत्रों को गांधी सागर परियोजना से उत्पादित बिजली मिलती थी।
एमपी ट्रांसको के प्रबंध संचालक सुनील तिवारी ने कहा कि 60 वर्षों की यह उपलब्धि पूर्ववर्ती विद्युत मंडल और वर्तमान मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी के अभियंताओं, तकनीकी कर्मचारियों तथा पूर्व कार्मिकों के समर्पित प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और निरंतर उन्नयन के सहारे यह सबस्टेशन आगे भी इंदौर और मालवा क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।















