हैदराबाद, 29 अगस्त।
तेलंगाना हाई कोर्ट में सामने आया एक मामला पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा करता है। हत्या के दोषी एक व्यक्ति को 30 दिन की पैरोल मिली थी। वह 17 दिसंबर 1983 को पैरोल पर बाहर आया और फिर कभी जेल नहीं लौटा। सजा पाए व्यक्ति को जेल में होना चाहिए था, लेकिन वह सरकारी स्कूल में नौकरी करता रहा और 2013 में रिटायर भी हो गया। 2024 तक वह खुलेआम घूमता रहा और उसे बेस्ट टीचर का अवार्ड तक मिल गया। किसी को भनक नहीं लगी। सवाल है कि यह किसकी नाकामी है - जेल प्रशासन की, पुलिस की या उस पूरी व्यवस्था की, जो अपराधियों को पकड़कर जेल में रखने का दावा करती है?
सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्य किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं हैं। 17 दिसंबर 1983 को आरोपी को 30 दिन की पैरोल पर रिहा किया गया था। नियम के मुताबिक उसे 17 मार्च 1984 तक जेल लौटना था, लेकिन वह नहीं आया। जेल प्रशासन ने कागजों में उसे फरार दिखाया और मामला आगे बढ़ाने के बजाय फाइल बंद कर दी। पुलिस ने भी एक-दो बार खानापूर्ति के लिए पत्र भेजे और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। दूसरी ओर वह व्यक्ति बाहर अपना नया जीवन शुरू कर चुका था। उसने सरकारी नौकरी हासिल की, बच्चों को पढ़ाया और वर्षों तक सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीता रहा। जिस व्यक्ति पर हत्या का दोष सिद्ध हो चुका था, वही बच्चों को ईमानदारी और कानून का पाठ पढ़ाता रहा।
जरा उस पीड़ित परिवार के बारे में सोचिए, जिसने अपना कोई खोया था। आरोपी को सजा मिलने के बाद परिवार को लगा होगा कि न्याय हुआ, लेकिन कातिल तो 30 दिन की पैरोल के बाद ही आजाद हो गया और सरकारी शिक्षक बन बैठा। परिवार चार दशक तक इस उम्मीद में रहा होगा कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन कानून की निगरानी करने वाला तंत्र ही सोया रहा। यह केवल एक कैदी के फरार होने का मामला नहीं है। यह पीड़ित परिवार के साथ न्याय की दूसरी हत्या है।
सबसे बड़ा सवाल जेल प्रशासन पर है। पैरोल पर गया व्यक्ति तय समय पर वापस नहीं लौटा तो तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उसकी तलाश के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या किया? क्या पैरोल की निगरानी के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं थी? यदि पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजे गए थे और बाद में स्पेशल टास्क फोर्स भी बनाई गई थी, तो कार्रवाई जमीन पर क्यों नहीं दिखाई दी? सरकारी स्कूल में नौकरी कर रहे व्यक्ति को दशकों तक खोज न पाना पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इससे भी बड़ा सवाल सरकारी नौकरी मिलने का है। सरकारी सेवा में पुलिस सत्यापन और चरित्र प्रमाण पत्र की प्रक्रिया होती है। फिर हत्या के दोषी और फरार व्यक्ति का पुराना रिकॉर्ड सामने क्यों नहीं आया? यदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी मिली तो इसकी भी जांच होनी चाहिए और यदि सत्यापन के बावजूद नौकरी मिली तो व्यवस्था की गंभीर खामी सामने आती है। 2004 में उसे बेस्ट टीचर का सम्मान मिलना तो विडंबना की पराकाष्ठा है।
तेलंगाना हाई कोर्ट ने मामले पर चिंता जताते हुए पैरोल खत्म होने के बाद कैदियों की वापसी सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देशों की जरूरत बताई है। सरकार को इसे महज एक मामले के रूप में नहीं देखना चाहिए। जेल और पुलिस के रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से जोड़ना होगा। पैरोल पर गए कैदियों की नियमित निगरानी, समय पर हाजिरी और तय अवधि में वापसी सुनिश्चित करनी होगी। सरकारी नौकरी में सत्यापन व्यवस्था को भी अधिक प्रभावी बनाना होगा। कानून सबके लिए समान है, लेकिन उसकी निगरानी करने वाला सिस्टम यदि चालीस साल तक सोता रहे तो न्याय व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?
वाह रे हमारा सिस्टम, जिसने एक हत्यारे को चालीस साल तक मास्टर बनाए रखा और न्याय को जेल में बंद रखा।














