बिश्केक, 31 अगस्त।
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन से पहले भारत, चीन और रूस समेत कई देशों के शीर्ष नेता एकत्र हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने इस बैठक को वैश्विक कूटनीति के लिहाज से विशेष महत्व दे दिया है। पश्चिमी देशों के साथ कई सदस्य राष्ट्रों के बढ़ते तनाव के बीच आयोजित हो रहा यह सम्मेलन दुनिया के बदलते शक्ति समीकरणों पर भी केंद्रित माना जा रहा है।
शिखर सम्मेलन के दौरान औपचारिक बैठकों से पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय वार्ताएं कीं। रूसी सरकारी मीडिया के अनुसार, पुतिन ने शी जिनपिंग के साथ बातचीत के दौरान चीन के साथ वीजा-मुक्त व्यवस्था को स्थायी स्वरूप देने की रूस की इच्छा व्यक्त की।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हुई बैठक में रूसी राष्ट्रपति ने भारत और रूस के संबंधों को लगातार मजबूत होते हुए बताया। दोनों देशों के नेताओं के बीच द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई।
एससीओ शिखर सम्मेलन की औपचारिक बैठक मंगलवार से शुरू होगी। इस दौरान राष्ट्रपति पुतिन की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से भी मुलाकात प्रस्तावित है। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में रूस और ईरान दोनों ही एससीओ को गैर-पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देख रहे हैं।
शंघाई सहयोग संगठन को मूल रूप से क्षेत्रीय सहयोग और सुरक्षा के लिए स्थापित संगठन के तौर पर जाना जाता है, लेकिन बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच इसका रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। सदस्य देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को लेकर इस मंच की भूमिका वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
चीन लगातार एससीओ के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग के नए स्वरूप को आगे बढ़ाने की बात करता रहा है। दूसरी ओर रूस बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के विचार का समर्थन करता है। ऐसे में बिश्केक में जुटे विभिन्न देशों के शीर्ष नेताओं की बैठकों और आपसी संवाद पर दुनिया की नजर बनी हुई है।
प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति पुतिन की मौजूदगी वाले इस शिखर सम्मेलन को बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिमी और गैर-पश्चिमी देशों के बीच उभरते नए समीकरणों के दौर में एससीओ के इस मंच से होने वाली चर्चाएं अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा के लिहाज से भी अहम हो सकती हैं।















