भोपाल, 31 अगस्त।
सड़कों पर घूमने वाले पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। उच्चतम न्यायालय की सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे ने स्थानीय स्तर पर समितियां गठित कर जनसहयोग लेने और बेहतर कार्य करने वालों को प्रोत्साहन राशि देने की आवश्यकता बताई।
न्यायमूर्ति सप्रे ने भोपाल में आयोजित उच्चतम न्यायालय की सड़क सुरक्षा समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए यह बात कही। मुख्य सचिव कार्यालय में हुई बैठक में मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल, पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
बैठक में पशुओं समेत अन्य कारणों से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक योजनाएं तैयार कर निर्धारित समय-सीमा में लागू करने पर जोर दिया गया। इंदौर, भोपाल और उज्जैन में शून्य मृत्यु जिला कार्यक्रम शुरू करने पर सहमति बनी। वर्तमान में धार, सतना, रीवा, सागर, जबलपुर और खरगौन सहित उज्जैन, भोपाल एवं इंदौर जिलों में इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है।
प्रदेश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण कर दुर्घटना स्थलों और उनके कारणों की पहचान की जाएगी। इसके आधार पर ऐसी कार्ययोजना तैयार की जाएगी, जिससे भविष्य में उन्हीं स्थानों और समान परिस्थितियों में दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके और योजना का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो।
न्यायमूर्ति सप्रे ने सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों की संख्या कम करने के निर्देश दिए। उन्होंने सड़क सुरक्षा के लिए चार प्रमुख क्षेत्रों इंजीनियरिंग, आपातकालीन देखभाल, प्रवर्तन और शिक्षा पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की बात कही। राज्य सरकार से कार्यक्रमों के लिए आवश्यक वित्तीय प्रावधान सुनिश्चित करने तथा क्रियान्वयन में सामाजिक उत्तरदायित्व निधि और तकनीक का सहयोग लेने पर भी जोर दिया गया।
बैठक में भारत सरकार के परिवहन एवं राजमार्ग अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चा का भी उल्लेख किया गया। इसमें बिना बीमा, ईंधन नहीं व्यवस्था पर विचार किया गया, ताकि सड़कों पर संचालित बड़ी संख्या में गैर-बीमित वाहनों का बीमा सुनिश्चित किया जा सके। इसे आमजन की सड़क सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना गया।
न्यायमूर्ति सप्रे ने राज्य सरकार को इस व्यवस्था के लिए जल्द एक जिले में पायलट परियोजना शुरू करने के निर्देश दिए। इसके तहत पेट्रोल पंपों पर कैमरे लगाए जाएंगे और उन्हें वाहन पोर्टल से जोड़ा जाएगा, ताकि गैर-बीमित वाहनों को ईंधन उपलब्ध न कराया जाए। सबसे अधिक गैर-बीमित वाहनों वाले जिले का चयन कर पहले वहां परियोजना लागू की जाएगी और प्राप्त अनुभवों के आधार पर इसे अन्य जिलों तक क्रमशः बढ़ाया जाएगा।
सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने का भी निर्णय लिया गया। इसमें शिक्षा विभाग का सहयोग लिया जाएगा तथा शिक्षण संस्थानों और अन्य एजेंसियों के माध्यम से लोगों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाएगा। प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में औसतन 16 मिनट लगते हैं और इस समय को यथासंभव कम करने के प्रयास किए जाएंगे।
प्रदेश में हर वर्ष औसतन 13 हजार लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत होती है। राज्य सरकार के विशेष प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 2026 के पहले छह माह की तुलना वर्ष 2025 की समान अवधि से करने पर सड़क हादसों में होने वाली मौतों में करीब 800 की कमी दर्ज की गई है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2026 में पिछले वर्षों की अपेक्षा दुर्घटनाओं की संख्या और कम करना है।
बैठक की शुरुआत में मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने उच्चतम न्यायालय की सड़क सुरक्षा समिति के निर्देशों, केंद्र सरकार की योजनाओं और प्रदेश सरकार द्वारा सड़क हादसे रोकने के लिए लिए गए अल्पकालिक व दीर्घकालिक निर्णयों तथा प्रस्तावित कार्ययोजना की जानकारी दी। परिवहन सचिव मनीष सिंह ने सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों और राज्य सरकार की ओर से किए गए सुरक्षा उपायों पर प्रस्तुतीकरण दिया।
प्रस्तुतीकरण में सड़क हादसों के तुलनात्मक आंकड़े, ब्लैक स्पॉट, हिट एंड रन मामले, विभिन्न विभागों के सड़क सुरक्षा उपाय, राहवीर योजना और प्रधानमंत्री राहत योजना से जुड़े बिंदुओं को शामिल किया गया। बैठक में लोक निर्माण, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, परिवहन, एमपीआरडीसी, नगरीय प्रशासन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आयुष्मान, एमपीआरआरडीए, एनएचएआई, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और अन्य संबंधित संस्थाओं के अधिकारी भी मौजूद रहे।















