नई दिल्ली, 01 सितंबर।
भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर विश्व बैंक द्वारा गठित मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को सख्ती से खारिज कर दिया है। भारत ने स्पष्ट कहा है कि वह इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को कभी स्वीकार नहीं करता और उसके फैसले कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं।
विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि भारत ने न तो इस मध्यस्थता प्रक्रिया को मान्यता दी, न ही इसकी कार्यवाही में भाग लिया। इसलिए न्यायालय के किसी भी निर्णय से भारत बाध्य नहीं होगा।
भारत ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि फिलहाल स्थगित स्थिति में बनी हुई है।
यह प्रतिक्रिया हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय के उस फैसले के बाद आई है, जिसमें कहा गया था कि संधि को रोकने के लिए भारत द्वारा बताए गए कारण उसके निलंबन या समाप्ति को उचित नहीं ठहराते। न्यायालय ने भारत से 1960 के जल बंटवारे संबंधी समझौते के दायित्वों का पालन जारी रखने को कहा था।
भारत ने इस निर्णय को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। विदेश मंत्रालय का कहना है कि मध्यस्थता न्यायालय का गठन ही संधि की शर्तों के विरुद्ध किया गया था और उसे भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार नहीं है।
भारत ने पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा और लगातार सीमा पार आतंकवाद का हवाला देते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था।
नई दिल्ली लगातार कहता रहा है कि संधि से जुड़ा फैसला भारत का संप्रभु विषय है। मध्यस्थता न्यायालय के बयान या फैसले भारत की जल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से संबंधित निर्णयों को प्रभावित नहीं करेंगे।















