जोधपुर, 01 सितंबर।
प्रकृति के साथ पीढ़ियों से जुड़े भारतीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के पारंपरिक ज्ञान में पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान खोजने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर शोध कर रहा है। इस अध्ययन में आकाश, तारों, ऋतुओं, खेती, पौधों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी पारंपरिक समझ को आधुनिक संदर्भ में परखा जा रहा है।
संस्थान के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के सहायक प्रोफेसर डॉ. भास्कर कुमार काकती देश के अलग-अलग हिस्सों के जनजातीय समुदायों और राजस्थान के ग्रामीण लोगों के साथ मिलकर उनके पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं। शोध का उद्देश्य इस ज्ञान को दर्ज करने के साथ उसके वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व को समझना है।
डॉ. काकती के अनुसार, पारंपरिक ज्ञान केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ लंबे अनुभव और पीढ़ियों के जुड़ाव से विकसित समझ है। शोध के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी मौजूदा चुनौतियों में इसके उपयोग की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जनजातीय खगोल ज्ञान है। इसके तहत विभिन्न समुदायों द्वारा आकाश, तारों, ऋतुओं और प्रकृति के चक्रों को समझने के तरीकों का अध्ययन किया जा रहा है।
पारंपरिक अवलोकनों की तुलना भारतीय ज्ञान प्रणाली से भी की जा रही है। विभिन्न जनजातीय समुदायों में प्रचलित खगोलीय ज्ञान का शब्दकोश तैयार किया गया है, ताकि इस ज्ञान को संरक्षित करने के साथ आधुनिक शोध में उसकी उपयोगिता को समझा जा सके।
राजस्थान की पारंपरिक कृषि पद्धतियां भी इस शोध का प्रमुख हिस्सा हैं। अध्ययन में खेती और प्रकृति से जुड़ी मान्यताओं तथा परंपराओं की भूमिका को जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन के संदर्भ में देखा जा रहा है।
शोध में आध्यात्मिक पारिस्थितिकी की अवधारणा पर भी काम किया जा रहा है। इसके जरिए यह समझने का प्रयास है कि प्रकृति के साथ सांस्कृतिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध लोगों के पर्यावरण संबंधी व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
यह कार्य केवल पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण तक सीमित नहीं है। शोधकर्ता इन पद्धतियों के माध्यम से वास्तविक पर्यावरणीय लाभ प्राप्त करने की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं।
राजस्थान के नांदिया कलां गांव की खराब हो चुकी सामुदायिक भूमि पर विकसित नक्षत्र वाटिका इसका उदाहरण है। इस पहल में पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और आधुनिक पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के प्रयासों को एक साथ जोड़ा गया।
इससे जैव विविधता को पुनर्जीवित करने, औषधीय पौधों के संरक्षण और समुदाय की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिली। डॉ. काकती ने बताया कि स्थानीय समुदाय जब संरक्षण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनते हैं तो ऐसे प्रयास अधिक प्रभावी और सार्थक होते हैं।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान, सामुदायिक स्वामित्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मेल कमजोर हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू पारंपरिक ज्ञान को टिकाऊ आर्थिक अवसरों से जोड़ना भी है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की एस्पायर योजना के माध्यम से डॉ. काकती आईआईटी जोधपुर के आजीविका व्यवसाय संवर्धन केंद्र के साथ ग्रामीण समुदायों को कौशल विकास, उद्यमिता प्रशिक्षण और सरकारी सहायता कार्यक्रमों से जोड़ने पर कार्य कर रहे हैं।
इस पहल के जरिए यह तलाशा जा रहा है कि पारंपरिक ज्ञान ग्रामीण समुदायों के लिए उद्यमिता, कौशल विकास और टिकाऊ आजीविका के नए अवसर कैसे तैयार कर सकता है।
शोध के अगले चरण में पारंपरिक ज्ञान को उपयुक्त तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर जलवायु परिवर्तन तथा टिकाऊ विकास के व्यावहारिक समाधान तलाशने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इस कार्य में अभियांत्रिकी, पर्यावरण विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और ग्रामीण विकास जैसे विभिन्न क्षेत्रों को एक साथ लाया जा रहा है।















