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संपादकीय
01 Sep, 2026

परिसीमन पर सियासी घमासान, विशेष सत्र से खुलेगा नया मोर्चा: किरेन रिजिजू के बयान से गर्माई दिल्ली, कांग्रेस ने पीएम से मांगा जवाब

परिसीमन और संभावित विशेष सत्र को लेकर केंद्र व विपक्ष आमने-सामने हैं, खड़गे ने प्रधानमंत्री से सर्वदलीय चर्चा और सीटों को 25 वर्षों तक फ्रीज रखने की मांग की है।

नई दिल्ली, 01 सितंबर।

केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच एक बार फिर परिसीमन के मुद्दे पर बड़ी टकराहट शुरू हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा एक टीवी इंटरव्यू में दिए गए बयान ने देश की राजनीति को गरमा दिया है। उनके बयान के बाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गंभीरता दिखाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुलाने की भी मांग की है।

अपनी चिट्ठी में खड़गे ने मांग की है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या और राज्यों के आधार पर सीटों के आवंटन को अगले 25 वर्षों के लिए फ्रीज कर दिया जाए। इसके अलावा मल्लिकार्जुन खड़गे ने 2029 के अगले लोकसभा चुनावों से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत प्रभाव से लागू करने की मांग की है। पीएम मोदी के नाम लिखी इस चिट्ठी में खड़गे ने कहा है कि सरकार परिसीमन को लेकर जो भी प्रस्ताव तैयार कर रही है, उस पर चर्चा के लिए सभी राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों की एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए।

खड़गे का कहना है कि प्रस्तावित मसौदे को संसद में लाने से पहले सभी विपक्षी दलों को उसका अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए। खड़गे ने अपने पत्र में 16 जुलाई 2026 को लिखे गए अपने पिछले पत्र का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने सर्वदलीय बैठक की मांग की थी।

विशेष सत्र की अटकलें तेज, मानसून सत्र के सत्रावसान में देरी क्यों? उन्होंने कहा कि केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री द्वारा हाल ही में दिए गए एक टीवी इंटरव्यू के बाद यह साफ होता जा रहा है कि सरकार परिसीमन से जुड़ा नया विधेयक लाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। खड़गे के अनुसार, शायद यही कारण है कि संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान करने में लगातार देरी की जा रही है।

सरकार अगस्त के आखिर या सितंबर की शुरुआत में विशेष सत्र बुला सकती है। इस सत्र में परिसीमन से जुड़ा विधेयक लाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण जरूरी है, ताकि अधिक आबादी वाले राज्यों को सही प्रतिनिधित्व मिल सके। लेकिन दक्षिण के राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, इसलिए उन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए।

17 अप्रैल 2026 को बजट सत्र के दौरान मोदी सरकार द्वारा लाया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था। 528 सांसदों में से 298 ने इसके पक्ष में और 230 ने इसके खिलाफ मतदान किया था, जिससे यह विधेयक गिर गया था। हालांकि, पहले की तुलना में संसद में एनडीए की स्थिति मजबूत हुई है। सबसे पहले पंजाब से आने वाले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के सात सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया था। इसके बाद पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद लोकसभा के 20 सांसदों ने अपना अलग गुट बना लिया है और सरकार को डीएमके और शरद पवार की पार्टी से भी इस मुद्दे पर समर्थन मिलने की उम्मीद है।

दक्षिण बनाम उत्तर की नई बहस परिसीमन का मुद्दा केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच संतुलन का भी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है, जबकि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है। यदि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो उत्तर भारत की सीटें बढ़ेंगी और दक्षिण की सीटों का अनुपात घटेगा। इसी को लेकर दक्षिण के दल चिंतित हैं। डीएमके के नेता एम. के. स्टालिन पहले ही कह चुके हैं कि यह दक्षिण के साथ अन्याय होगा।

खड़गे ने अपनी चिट्ठी में महिला आरक्षण का मुद्दा भी उठाया है। संसद ने महिला आरक्षण विधेयक तो पास कर दिया है, लेकिन वह परिसीमन के बाद ही लागू होगा। कांग्रेस की मांग है कि इसे 2029 से ही लागू किया जाए, ताकि महिलाओं को जल्द प्रतिनिधित्व मिल सके। सरकार का कहना है कि परिसीमन के बाद ही सीटों की पहचान हो पाएगी कि कौन-सी सीट महिला के लिए आरक्षित होगी।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन जैसा बड़ा फैसला अकेले सरकार नहीं ले सकती, क्योंकि यह देश के संघीय ढांचे से जुड़ा है। इसमें सभी राज्यों की राय लेना जरूरी है। यदि सरकार बिना चर्चा के विधेयक लाती है तो इसका विरोध होगा। खड़गे ने कहा कि 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने 25 साल के लिए परिसीमन को फ्रीज किया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा मिल सके। उसी तरह अब भी 25 साल के लिए फ्रीज जारी रहना चाहिए।

अब सबकी नजर प्रधानमंत्री के जवाब पर है। यदि सरकार विशेष सत्र बुलाती है तो यह सत्र काफी हंगामेदार रहने वाला है। विपक्ष पूरी ताकत से सरकार को घेरने की तैयारी में है, वहीं सरकार अपने सहयोगी दलों के साथ बहुमत का गणित साधने में लगी है। आने वाले दिनों में दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने वाली हैं। यह तय है कि परिसीमन विधेयक भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला साबित होगा।

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