भोपाल, 2 सितंबर।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की युगल पीठ, न्यायमूर्ति एम.आर. फड़के एवं न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव ने आलोक शर्मा बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश एवं अन्य की याचिका में स्पष्ट कर दिया है कि अनुकम्पा नियुक्ति कोई "विरासत में मिलने वाला अधिकार" नहीं है। पीठ ने 28 वर्ष पुराने दावे को खारिज करते हुए कहा कि अनुकम्पा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक मदद देना है, न कि वर्षों बाद नौकरी की मांग करना।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता सरकारी कर्मचारी थे और वर्ष 1996 में उनकी मृत्यु हो गई थी। पिता की मृत्यु के करीब 28 वर्ष बाद याचिकाकर्ता ने अनुकम्पा नियुक्ति की मांग को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उस समय वह नाबालिग था, इसलिए अब वयस्क होने पर वह नियुक्ति का हकदार है।
युगल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अनुकम्पा नियुक्ति कोई पैतृक या विरासत वाला अधिकार नहीं है।
युगल पीठ ने कहा -
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उद्देश्य तत्काल राहत का है: अनुकम्पा नियुक्ति की योजना इसीलिए बनी है, ताकि कर्मचारी की अचानक मृत्यु से परिवार पर आए आर्थिक संकट को तुरंत दूर किया जा सके। 28 वर्ष बाद इस आधार पर मांग करना योजना के उद्देश्य के खिलाफ है।
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समय की सीमा जरूरी है: अगर हर कोई दशकों बाद दावा करने लगे तो सरकारी विभागों के लिए पद सुरक्षित रखना संभव नहीं होगा। इससे प्रशासनिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी।
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अधिकार नहीं, छूट है: अनुकम्पा नियुक्ति एक "कल्याणकारी योजना" है, "अधिकार" नहीं। सरकार तय नियमों के तहत दे सकती है, लेकिन मांगने वाला इसे मांग नहीं सकता।
पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि अनुकम्पा नियुक्ति के लिए मृत्यु के "तुरंत बाद" आवेदन करना जरूरी है। लंबा इंतजार करने पर यह माना जाएगा कि परिवार ने बिना नौकरी के भी खुद को संभाल लिया है।
यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों के लिए एक नसीहत है। अक्सर देखा जाता है कि लोग वर्षों बाद अनुकम्पा नियुक्ति की मांग करते हैं।
पीठ ने कहा कि अगर वास्तविकता में आर्थिक तंगी थी तो आवेदन समय पर देना होगा। 25 से 30 वर्षों पश्चात की गई मांग को स्वीकार करना न तो कानून के हिसाब से उचित है और न ही व्यावहारिक।
कुल मिलाकर उच्च न्यायालय ने यह संदेश दिया कि अनुकम्पा का मतलब "दया" है, "दावा" नहीं। और दया भी तभी मांगी जा सकती है, जब जरूरत तत्काल हो।
21 वर्ष पश्चात आवेदन करने पर अनुकम्पा नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश
राजस्थान उच्च न्यायालय की युगल पीठ, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा एवं न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा ने उम्मेद सिंह बनाम सीएसआईआर एवं अन्य की याचिका में निर्णय किया है कि कर्मचारी की मृत्यु के 21 साल बाद अनुकम्पा नियुक्ति पर कब विचार किया जा सकता है।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत थे। जब उनकी मृत्यु हुई, तब याचिकाकर्ता सिर्फ 2 वर्ष 5 माह का था। पिता के पीछे पत्नी, 5 बेटियां और याचिकाकर्ता रह गए।
परिवार का पूरा बोझ दादा-दादी पर आ गया। आय का एकमात्र साधन पिता की पेंशन थी और 3 बहनों की शादी के लिए दादा को भारी कर्ज लेना पड़ा।
याचिकाकर्ता ने बालिग होने के बाद तुरंत अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। विभाग ने यह कहकर खारिज कर दिया कि बहुत देरी हो गई है और परिवार इतने वर्षों से भरण-पोषण कर रहा है तो आर्थिक संकट नहीं कहा जा सकता।
उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने कहा -
«सिर्फ इसलिए कि परिवार वर्षों तक जिंदा रहा, इसे इस बात का सबूत नहीं माना जा सकता कि उसका आर्थिक संकट खत्म हो गया है।»
पीठ ने मुख्य तीन बातें कहीं -
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गरिमापूर्ण जीवन ही पैमाना: अनुकम्पा नियुक्ति में परिवार की आर्थिक स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने की क्षमता के संदर्भ में देखना होगा।
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देरी नहीं हुई: आवेदक नाबालिग था, बालिग होते ही उचित समय में आवेदन किया, इसलिए देरी का तर्क नहीं चलेगा।
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तकनीकी आधार पर खारिज नहीं: नियम में ऐसी कोई शर्त नहीं है कि दूसरे पात्र सदस्यों ने पहले आवेदन नहीं किया तो बेटा अयोग्य हो जाएगा। हाइपर-टेक्निकल ग्राउंड पर दावा खारिज नहीं हो सकता।
पीठ ने अधिकारियों को याचिकाकर्ता के मामले पर अनुकम्पा नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया है।














