वाशिंगटन, 02 सितंबर।
अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के जीवन में एक नया संकट खड़ा हो गया है। यह संकट नौकरी का नहीं, बल्कि जीवनसाथी के रोजगार और अस्तित्व का है। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने एच-4 डिपेंडेंट स्पाउस को मिलने वाली वर्क परमिट की सुविधा खत्म करने का प्रस्ताव अपने एजेंडे में शामिल किया है। ऊपर से देखने पर यह केवल एक प्रशासनिक फैसला लगता है, लेकिन जमीन पर यह लाखों पति-पत्नी के रिश्तों को अलग-अलग कर रहा है।
2015 में मिला था सहारा, अब वही छिनने की तैयारी। 2015 में जब ओबामा प्रशासन ने योग्य एच-4 जीवनसाथियों को इंप्लॉयमेंट ऑथराइजेशन डॉक्यूमेंट यानी ईएडी के लिए आवेदन की अनुमति दी थी, तो अमेरिका में बसे भारतीय परिवारों ने राहत की सांस ली थी। उस नियम के तहत यदि एच-1बी धारक के आई-140 का अप्रूवल हो गया हो या वह छह साल से अधिक समय से अमेरिका हो तो उसके जीवनसाथी को काम करने की अनुमति मिल सकती थी। इस एक नियम ने हजारों घरों में दूसरी आय का रास्ता खोला था। पत्नियां, जो अब तक केवल घर संभाल रही थीं, वे भी आईटी, स्कूल, हेल्थ और अन्य क्षेत्रों में काम करने लगी थीं। आत्मनिर्भरता आई थी और परिवार स्थिर हुआ था। अब उसी नियम को पलटने की तैयारी है।
डीएचएस का कहना है कि एच-4 को काम की अनुमति देना अमेरिकी श्रमिकों के हित में नहीं है। प्रस्ताव के तहत एच-1बी गैर-आप्रवासी कर्मियों के कुछ एच-4 जीवनसाथियों को रोजगार अनुमति के लिए पात्र वर्ग से हटाया जा सकता है। इससे 2015 में लागू उस नियम को वापस लेने की कोशिश होगी। हालांकि, यह अभी शुरुआती स्तर का प्रस्ताव है और तत्काल कोई वर्क परमिट रद्द नहीं होगा, लेकिन प्रस्ताव को अंतिम रूप देने को लेकर जो अनिश्चितता बनी है, वही परिवारों में तनाव पैदा कर रही है।
पति एक शहर में, पत्नी दूसरे शहर में जाने को मजबूर। इस फैसले का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि यह पति और पत्नी को अलग-अलग निर्णय लेने पर मजबूर कर रहा है। कई परिवारों में पति एच-1बी पर सिलिकॉन वैली या सिएटल में अच्छी नौकरी पर है और पत्नी एच-4 ईएडी पर न्यूयार्क या टेक्सास में नौकरी कर रही है। दोनों ने मिलकर मकान लिया है, बच्चों का स्कूल तय है, लेकिन यदि पत्नी का वर्क परमिट खत्म होता है तो उसके पास दो ही रास्ते बचते हैं - या तो वह अमेरिका में बिना काम के पति पर निर्भर होकर रहे या फिर भारत लौट जाए या कनाडा जैसे किसी अन्य देश में नौकरी तलाशे।
बहुत से दंपत्ति इस दोराहे पर खड़े हैं। पति नहीं चाहता कि उसकी पत्नी का करियर खत्म हो और पत्नी नहीं चाहती कि वह केवल वीजा पर निर्भर रहे। इसका नतीजा यह हो रहा है कि कई परिवारों में पति अमेरिका में रहकर नौकरी कर रहा है और पत्नी कनाडा चली गई है, ताकि वह वहां वर्क परमिट पर काम कर सके। बच्चे कभी पिता के पास तो कभी मां के पास रहते हैं। यह कैसा परिवार है, जहां वीजा तय करता है कि पति-पत्नी साथ रहेंगे या अलग?
भारतीय समाज में अक्सर कहा जाता है कि पत्नी पति के साथ है, लेकिन अमेरिका में एच-4 पर आई कई पढ़ी-लिखी महिलाओं ने अपनी अलग पहचान बनाई थी। वे इंजीनियर थीं, डॉक्टर थीं, शिक्षक थीं। 2015 के बाद उन्हें लगा था कि उनका करियर फिर शुरू हो सकता है। उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश की, लेकिन अब फिर वही पुरानी स्थिति लौटती दिख रही है कि वह केवल एच-1बी धारक की पत्नी हैं, उनकी अपनी कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं है। कई महिलाओं ने बताया कि बिना काम के घर में रहना उनके लिए मानसिक तनाव का कारण बन रहा है। डिप्रेशन बढ़ रहा है और रिश्तों में कड़वाहट आ रही है। जब दोनों कमाते थे तो बराबरी थी। अब एक पर निर्भरता से रोजमर्रा के फैसलों में भी टकराव बढ़ रहा है।
भारतीय परिवारों पर सबसे ज्यादा मार। अमेरिका में एच-1बी धारकों में करीब 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय हैं। इसलिए इस नियम का सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर ही पड़ेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक करीब एक लाख से अधिक एच-4 धारक इस समय ईएडी पर काम कर रहे हैं, जिनमें अधिकांश भारतीय महिलाएं हैं। यदि यह नियम खत्म होता है तो न केवल एक लाख नौकरियां जाएंगी, बल्कि एक लाख परिवारों की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी। पात्र एच-4 धारकों को अपने वर्क परमिट की वैधता पर नजर रखनी चाहिए और नवीनीकरण में देरी नहीं करनी चाहिए। साथ ही प्रायोरिटी डेट, आई-140 नोटिस, पासपोर्ट और इमिग्रेशन स्टेटस से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रखना उपयोगी होगा। विशेषज्ञ यह भी सलाह दे रहे हैं कि विशेष योग्यताओं के मुताबिक पात्र एच-4 धारक अपने वर्क परमिट की वैधता पर नजर रखें और वैकल्पिक वीजा विकल्पों पर विचार करें।
अमेरिका में कई भारतीय संगठनों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ आवाज उठाई है। उनका कहना है कि एच-4 ईएडी से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ है। टैक्स के रूप में सरकार को राजस्व मिला है और कंपनियों को प्रतिभाशाली कर्मचारी बनाए रखने में मदद मिली है। यदि पत्नी को काम करने नहीं दिया जाएगा तो पति भी अमेरिका छोड़कर कनाडा या अन्य देशों में जाने को मजबूर होगा। इससे अमेरिका की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी।
यह मुद्दा केवल वीजा का नहीं है। यह परिवार को एक साथ रखने का मुद्दा है। पति और पत्नी का रिश्ता भरोसे और बराबरी पर टिकता है। जब वीजा की वजह से एक जीवनसाथी को अपने करियर और पहचान से समझौता करना पड़े तो वह रिश्ता संकट में आ जाता है। अमेरिका में एच-4 पर आया यह संकट केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि मानवीय संकट है। यह पति-पत्नी को अलग-अलग करने वाला निर्णय बनता जा रहा है। एक ओर पति की नौकरी है, दूसरी ओर पत्नी का आत्मसम्मान है। दोनों के बीच वीजा की दीवार खड़ी हो गई है। देखना होगा कि ट्रंप प्रशासन इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देता है या परिवारों की आवाज सुनकर इसे वापस लेता है, लेकिन तब तक लाखों भारतीय परिवारों के लिए यह जीवनसाथी संकट बना रहेगा।















