रायगढ़, 2 सितंबर।
महाराष्ट्र के रायगढ़ में जो हुआ, वह केवल एक रिश्वत कांड नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल है। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने सीजीएसटी के एडिशनल कमिश्नर और सुपरिटेंडेंट को 40 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा है। आरोप है कि जीएसटी और रॉयल्टी विवाद को निपटाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपये की मांग की गई थी। बाद में सौदा 40 लाख रुपये में तय हुआ और एक निजी व्यक्ति को माध्यम बनाया गया। यह घटना बताती है कि जब भ्रष्टाचार रोकने के जिम्मेदार ही भ्रष्टाचार करने लगें तो भरोसा कहां बचेगा। रक्षक ही भक्षक बन जाए तो क्या हो?
देश में जीएसटी विभाग का काम कर वसूली और कर व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है। व्यापारी से लेकर छोटे कारोबारी तक इस विभाग पर भरोसा करते हैं। लेकिन जब इसी विभाग के बड़े अधिकारी ही मामला निपटाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपये मांगने लगें तो यह भरोसा टूटता है। रायगढ़ में एक पत्थर खनन कंपनी से जुड़े मामले में जो हुआ, वह इसी टूटते भरोसे की कहानी है। सरकारी कर्मचारियों ने रिश्वत की रकम लेने के लिए निजी व्यक्ति को माध्यम बनाया, ताकि पकड़े जाने से बच सकें, लेकिन सीबीआई के जाल में फंस गए।
यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई जगह कर और जीएसटी विभाग के अधिकारी रिश्वत मांगते पकड़े गए हैं। फर्क केवल इतना है कि रायगढ़ में सीबीआई पहुंच गई और कार्रवाई हो गई। लेकिन देश के हर जिले और तहसील में सीबीआई नहीं पहुंच सकती। वहां क्या होता होगा, यह सोचने वाली बात है।
सीबीआई देश की बड़ी जांच एजेंसी है, लेकिन उसके संसाधन सीमित हैं। जीएसटी के मामले देशभर में हजारों की संख्या में हैं। हर केस में विवाद होता है, नोटिस आता है और व्यापारी डर जाता है। इसी डर का फायदा उठाकर कुछ अधिकारी मोटी रकम मांग लेते हैं। व्यापारी सोचता है कि 40 लाख रुपये देकर मामला खत्म कर लूं तो सस्ता पड़ेगा, नहीं तो सालों तक केस चलता रहेगा। यही वह जगह है, जहां सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत है।
जब खेत ही बाड़ खाने लगे तो केवल बाड़ बदलने से काम नहीं चलेगा, पूरे खेत की रखवाली का तरीका बदलना पड़ेगा। नागरिक जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। कानून में रिश्वत लेना और देना दोनों अपराध हैं, लेकिन अक्सर व्यापारी डर के कारण शिकायत नहीं करता। उसे लगता है कि शिकायत करूंगा तो और परेशान किया जाऊंगा। इसी मानसिकता को तोड़ना होगा। रायगढ़ के मामले में भी यदि शिकायतकर्ता हिम्मत करके सीबीआई के पास नहीं जाता तो यह खेल चलता रहता।
देशभर में शिकायत के लिए माध्यम उपलब्ध हैं, लेकिन कितने लोगों को इनके बारे में पता है? कितने व्यापारी इनका उपयोग करते हैं? जागरूकता की कमी ही भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी ताकत है। नागरिकों को समझना होगा कि जीएसटी मामले में नोटिस का जवाब देने और अपील करने का कानूनी तरीका है। यदि अधिकारी गलत मांग कर रहा है तो उसकी शिकायत की जा सकती है। 40 लाख देकर पीछा छुड़ाने से बेहतर है कि शिकायत का रास्ता अपनाया जाए।
सिस्टम में बदलाव जरूरी है। जीएसटी के हर नोटिस और फैसले को ऑनलाइन किया जाए, ताकि अधिकारी और व्यापारी के बीच सीधा लेनदेन कम हो। हर केस की समय-सीमा तय हो, ताकि उसे जानबूझकर लटकाकर रिश्वत न मांगी जा सके। जीएसटी विभाग में आंतरिक निगरानी को मजबूत किया जाए, ताकि बड़े अधिकारियों पर भी नजर रहे।
जब तक व्यापारी यह सोचेगा कि पैसा देकर काम करा लूंगा, तब तक भ्रष्टाचार रहेगा। जब तक अधिकारी यह सोचेगा कि डराकर पैसा ले लूंगा, तब तक भ्रष्टाचार रहेगा। दोनों को समझना होगा कि ईमानदारी ही सबसे सस्ता सौदा है। रायगढ़ की घटना चेतावनी है कि भ्रष्टाचार बड़े स्तर तक पहुंच चुका है। सीबीआई ने अपना काम कर दिया, लेकिन असली काम अब समाज को करना है। नागरिक जागरूक हों, व्यापारी एकजुट हों और सरकार व्यवस्था को पारदर्शी बनाए। तभी जीएसटी का डर नहीं, भरोसा होगा और खेत की बाड़ उसकी रक्षा करेगी।














