भोपाल, 2 सितंबर।
भोपाल का एक मामला पूरे देश की न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है। 1979 में शुरू हुआ 32,792 रुपये का वसूली विवाद 2026 में जाकर खत्म हुआ है। यानी पूरे 47 साल बाद दोनों पक्षों में मेडिएशन से समझौता हुआ और 90 हजार रुपये पर मामला निपटाया गया। सोचिए, 1979 में 32 हजार रुपये की कीमत क्या थी और आज 90 हजार रुपये की कीमत क्या है। क्या यह न्याय है या अन्याय की पराकाष्ठा है?
1979 से 2026 तक का सफर तारीखों का मकड़जाल रहा। यह मामला 1979 में भोपाल जिला अदालत में शुरू हुआ था। मध्य प्रदेश स्टेट एग्रो और पीडी महेश्वरी के बीच वसूली का विवाद था। मामला लंबा खिंचा और 2000 में अदालत ने स्टेट एग्रो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 12 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया, लेकिन इसके बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। इसके बाद हाई कोर्ट, जबलपुर में चुनौती दी गई। करीब 20 साल तक हाई कोर्ट में मामला चला और 13 अक्टूबर 2025 को हाई कोर्ट ने मामले को वापस भोपाल की नवम अपर जिला अदालत में भेज दिया। तब तक 46 साल बीत चुके थे और अंत में 12 अगस्त 2026 को मेडिएशन के जरिए 90 हजार रुपये पर समझौता हुआ।
90 हजार में क्या मिला, 47 साल का हिसाब कौन देगा? 1979 में 32,792 रुपये की कीमत आज के हिसाब से लाखों में होती है। यदि सामान्य महंगाई दर से भी हिसाब लगाया जाए तो आज उसकी कीमत करीब 9 लाख रुपये से अधिक बैठती है। लेकिन 47 साल के संघर्ष के बाद केवल 90 हजार रुपये में मामला खत्म हुआ। इसमें वकीलों की फीस, अदालत के चक्कर, मानसिक तनाव और समय की बर्बादी का हिसाब जोड़ा ही नहीं गया है। क्या यह न्याय है? यह तो न्याय के नाम पर समझौता है, जो मजबूरी में किया गया है।
वकील भी नहीं रहे जिंदा, जो केस लड़ रहे थे। इस मामले की सबसे दर्दनाक बात यह है कि 1979 में जिन अधिवक्ताओं ने इस मामले की पैरवी शुरू की थी, उनमें से आरके श्रीवास्तव अब इस दुनिया में नहीं हैं। यानी जिसने केस शुरू किया था, वह अपने केस का अंत देखने के लिए जीवित ही नहीं रहा। यह हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी हार है। जब न्याय इतना देर से मिले कि मांगने वाला ही न रहे, तो ऐसे न्याय का क्या लाभ?
आम आदमी का भरोसा टूटता है ऐसे मामलों से। देर से मिला हुआ न्याय भी अन्याय ही है। यह मामला इस कहावत को पूरी तरह सही साबित करता है। यदि एक छोटे से वसूली के मामले में 47 साल लग सकते हैं तो बड़े आपराधिक और जमीन-जायदाद के मामलों में कितना समय लगता होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। आम आदमी अदालत का नाम सुनते ही डर जाता है, क्योंकि उसे पता है कि एक बार केस में फंसा तो पूरी जिंदगी तारीखों में निकल जाएगी।
तारीख पर तारीख की संस्कृति कब खत्म होगी? हमारी अदालतों में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है। न्यायाधीशों की कमी, स्टाफ की कमी और पुरानी प्रक्रिया के कारण हर मामले में तारीख पर तारीख मिलती है। इस मामले में भी यही हुआ। 1993 में एकतरफा सुनवाई शुरू हुई, फिर 2000 में फैसला आया, फिर 2004 में चुनौती और फिर 2005 में हाई कोर्ट में मामला पहुंचा। इसके बाद 20 साल तक हाई कोर्ट में मामला लटका रहा। यह सिलसिला कभी खत्म ही नहीं हो रहा था।
अंत में मेडिएशन से ही सही, मामला खत्म हुआ। 47 साल बाद इस मामले का अंत मेडिएशन और आपसी सहमति से हुआ है। यह दर्शाता है कि यदि पहले ही मेडिएशन और लोक अदालत का सहारा लिया जाता तो यह मामला 47 साल तक नहीं खिंचता। छोटे-मोटे मामलों को अदालत से बाहर ही सुलझाने की जरूरत है, ताकि अदालतों पर बोझ कम हो और लोगों को जल्दी न्याय मिल सके। सरकार को चाहिए कि वह मेडिएशन को और अधिक मजबूत बनाए और हर जिले में इसके लिए विशेष केंद्र खोले।
यह मामला सरकार और न्यायपालिका दोनों के लिए एक चेतावनी है कि यदि सुधार नहीं हुए तो लोगों का भरोसा अदालतों से उठ जाएगा। फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ानी होगी, जजों की नियुक्ति करनी होगी और तकनीक का उपयोग करना होगा। ऑनलाइन सुनवाई और डिजिटल फाइलिंग से समय बचाया जा सकता है। साथ ही पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना होगा।
47 साल तक संघर्ष करने के बाद यदि 90 हजार रुपये मिले तो इसे क्या कहेंगे? क्या यह न्याय है या अन्याय? क्या यह जीत है या हार? यह मामला एक आईना है, जो हमें दिखाता है कि हमारी न्यायिक प्रणाली कितनी धीमी है और इसे कितने बड़े सुधार की जरूरत है। यदि आज भी नहीं जागे तो कल ऐसे ही सैकड़ों मामले 50 साल तक लटकते रहेंगे और न्याय केवल किताबों में ही रह जाएगा।















