राजगढ़, 02 सितंबर।
कभी-कभी एक हादसा केवल एक हादसा नहीं होता, बल्कि पूरी व्यवस्था की आंख खोलने वाला दस्तावेज बन जाता है। राजगढ़ के घुमावदार ब्रिज पर हुआ हादसा भी कुछ ऐसा ही है। लखनऊ से इंदौर आ रही एक स्लीपर बस तेज रफ्तार में अनियंत्रित होकर सुरक्षा दीवार से टकराई और चार लोगों की जान चली गई। पहली नजर में यह ड्राइवर की गलती या तेज रफ्तार का नतीजा लग सकता है, लेकिन जब इसकी परतें खुलीं तो पता चला कि गलती केवल स्टीयरिंग पर बैठे व्यक्ति की नहीं, बल्कि सड़क बनाने वाले हाथों की भी है।
हादसे के बाद जब नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने प्रदेश की सड़कों की लेखापरीक्षा रिपोर्ट विधानसभा में रखी तो तस्वीर और भी डरावनी निकली। 51 सड़कों के संयुक्त भौतिक निरीक्षण में सामने आया कि अधिकांश सड़कों पर सुरक्षा के बुनियादी मानकों का भी पालन नहीं हुआ है। कहीं घुमावदार हिस्सों पर सड़क को अतिरिक्त चौड़ाई नहीं दी गई तो कहीं तीखे मोड़ों पर जरूरी क्रैश बैरियर ही गायब हैं।
भोपाल, बुरहानपुर और उज्जैन संभाग की तीन सड़कों पर घुमावदार हिस्सों में कैरिजवे की चौड़ाई नहीं बढ़ाई गई। इसका सीधा मतलब है कि मोड़ पर दो वाहन एक साथ सुरक्षित तरीके से नहीं निकल सकते और टकराव की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यही नहीं, 13 संभागों के 26 सड़क कार्यों में 404.75 किलोमीटर लंबी सड़कों पर रिफ्लेक्टिव थर्मोप्लास्टिक मार्किंग ही नहीं मिली, जिन पर 478.27 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। रात के अंधेरे में जब सड़क पर सफेद पट्टी नहीं चमकेगी तो ड्राइवर को सड़क की सीमा का अंदाजा कैसे लगेगा?
सबसे गंभीर बात यह है कि नौ संभागों के 20 सड़क कार्यों में आवश्यकता होने के बावजूद क्रैश बैरियर नहीं लगाए गए हैं। नियम कहता है कि जहां तटबंध की ऊंचाई तीन मीटर से अधिक हो, जहां तीखा मोड़ हो, जहां पुल हो या सड़क किनारे कोई स्थायी बाधा हो, वहां क्रैश बैरियर अनिवार्य है, ताकि दुर्घटना की स्थिति में वाहन को नियंत्रित दिशा में रखा जा सके और वह खाई में न गिरे।
लेकिन जांच में पाया गया कि कई ऊंचे तटबंधों पर यह सुरक्षा कवच ही नहीं था। ऐसे में यदि कोई वाहन संतुलन खोए तो उसके पास बचने का कोई साधन ही नहीं रहता। राजगढ़ का वह घुमावदार ब्रिज, जिस पर हादसा हुआ, उसकी अधिकतम गति सीमा 35 किलोमीटर निर्धारित है। लेकिन क्या वहां स्पष्ट साइन बोर्ड थे? क्या रिफ्लेक्टिव टेप लगे थे? क्या क्रैश बैरियर की ऊंचाई और मजबूती मानकों के अनुरूप थी?
पुलिस ने प्रथम दृष्टया तेज गति को कारण बताया और एनएचएआई ने डिजाइन में कोई तकनीकी कमी नहीं होने की बात कही, लेकिन कैग की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है। सड़क सुरक्षा ऑडिट अक्सर केवल कागजों पर होता है, जमीन पर उसकी परछाई भी नहीं दिखती।
सड़कों की इस खतरनाक डिजाइन के पीछे एक पूरा अर्थशास्त्र भी काम करता है। ठेकेदार लागत बचाने के लिए सुरक्षा उपायों में कटौती कर देता है और विभागीय अधिकारी बिना भौतिक सत्यापन के बिल पास कर देते हैं। सड़क बन जाती है, फोटो खिंच जाती है, उद्घाटन भी हो जाता है, लेकिन सुरक्षा अधूरी रह जाती है। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक कोई इसकी सुध नहीं लेता। राजगढ़ हादसे ने इसी लापरवाही को उजागर किया है।
आज मध्य प्रदेश में 12 हजार किलोमीटर से अधिक स्टेट हाइवे का जाल है। सरकार हर साल सड़कों पर हजारों करोड़ खर्च करती है, लेकिन यदि सड़कें ही सुरक्षित नहीं हैं तो इस खर्च का क्या मतलब है? सड़क का काम केवल गिट्टी और डामर बिछाना नहीं है, बल्कि उसे सुरक्षित बनाना भी है।
सुरक्षित सड़क वह है, जहां मोड़ वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन हो, जहां अतिरिक्त चौड़ाई हो, जहां हर 100 मीटर पर रिफ्लेक्टर हो, जहां तटबंध पर क्रैश बैरियर हो और जहां गति सीमा के बोर्ड स्पष्ट रूप से दिखें। सड़कें सफर के लिए हैं, मौत के लिए नहीं।
राजगढ़ हादसे के बाद सरकार ने सभी सड़कों के सुरक्षा ऑडिट का आदेश दिया है। यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन ऑडिट केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
यदि किसी सड़क पर डिजाइन की कमी से हादसा होता है तो ठेकेदार और संबंधित इंजीनियर पर आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए। केवल मुआवजा बांटने से काम नहीं चलेगा। साथ ही सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मानकों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। जरूरी स्थानों पर क्रैश बैरियर लगाना, सड़क सुरक्षा ऑडिट को प्रभावी बनाना और रिफ्लेक्टिव मार्किंग को अनिवार्य करना ही वह रास्ता है, जो भविष्य के हादसों को रोक सकता है।
राजगढ़ का हादसा हमें एक कड़वा सच बताता है कि हम सड़कें तो बना रहे हैं, लेकिन सुरक्षा भूल रहे हैं। 51 सड़कों की जांच में मिली खामियां केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि आने वाले हादसों की चेतावनी हैं। यदि अब भी नहीं जागे तो घुमावदार ब्रिज और बिना बैरियर वाली सड़कें इसी तरह जान लेती रहेंगी।
जरूरत है कि सड़क को केवल निर्माण की वस्तु न मानकर जीवन की सुरक्षा की गारंटी के रूप में देखा जाए। तभी सफर आसान होगा और सड़कें मौत की डिजाइन नहीं कहलाएंगी।















