भोपाल, 2 सितंबर।
भोपाल में ई-कचरे का जहर किस तेजी से बढ़ रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छह साल में यह दस गुना हो गया है। एनजीटी ने पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है और केवल दस प्रतिशत ई-कचरे का ही वैज्ञानिक निस्तारण हो रहा है। यह आंकड़ा नहीं, बल्कि चेतावनी है कि हम अपने ही घर में अपने हाथों से जहर पैदा कर रहे हैं और उसे खुले में फेंककर खुद ही सांस ले रहे हैं। एनजीटी ने राजधानी में ई-कचरे के अवैज्ञानिक और अनियंत्रित निस्तारण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए मध्य प्रदेश सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भोपाल नगर निगम और अन्य संबंधित विभागों से जवाब तलब किया है। जांच और जमीनी कार्रवाई की तथ्यात्मक रिपोर्ट चार सप्ताह में पेश करने के लिए पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई है।
शहर में फैली लगभग 250 अनाधिकृत स्क्रैप यूनिट्स द्वारा बाकी कचरे को अवैध रूप से छांटा और नष्ट किया जा रहा है। मध्य प्रदेश देश का नौवां सबसे बड़ा ई-कचरा उत्पादक राज्य बन गया है। मोबाइल, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामानों को खुले में जलाने या अनुचित तरीके से नष्ट करने से हवा, पानी और मिट्टी में सीसा, पारा, कैडमियम और क्रोमियम जैसे जहरीले तत्व घुल रहे हैं। यह प्रदूषण गुर्दे, फेफड़ों और मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। प्रदेश में वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग 5000 टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है, जबकि वर्ष 2019 में यह आंकड़ा मात्र 500 टन था। हालांकि ई-कचरे के सटीक आकलन का कोई मानक फॉर्मूला नहीं है और आंकड़ों में पूरी स्पष्टता नहीं है। इंदौर में 800 टन, भोपाल में 415 टन, ग्वालियर में 400 टन और उज्जैन में 315 टन ई-कचरा प्रतिवर्ष उत्पन्न होने का आंकड़ा है। असली आंकड़ा इससे कई गुना अधिक हो सकता है, क्योंकि हर गली-मोहल्ले में कबाड़ी पुराने फ्रिज, कूलर, मोबाइल और लैपटॉप खरीदकर उन्हें तोड़ते हैं और धातुएं निकालते हैं।
ई-कचरा प्रबंधन नियम 2022 के तहत निर्माताओं, उत्पादकों, रीफर्बिशर्स और रीसाइकलर्स की जवाबदेही तय की गई है। खुले में कचरा जलाना, जलाशयों या जमीन पर फेंकना, एसिड से धातुएं निकालना और हाथों से उपकरण तोड़ना बेहद खतरनाक है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं को इसके संपर्क से अधिक जोखिम है। सबसे तीखा सवाल यह है कि जब नियम 2022 में बन गए तो छह साल तक सिस्टम क्या कर रहा था? प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या केवल फाइलों में साइन करता रहा? नगर निगम क्या केवल कागज पर कचरा उठाता रहा? यदि भोपाल में केवल दस प्रतिशत ई-कचरा ही वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित हो रहा है तो बाकी नब्बे प्रतिशत कहां जा रहा है - हवा में, पानी में या हमारे फेफड़ों में? एनजीटी को हस्तक्षेप करना पड़ा, यह सरकारी तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
केवल समिति बनाकर रिपोर्ट मांगने से कुछ नहीं होगा। जरूरत है सख्त कार्रवाई की। हर जिले में अधिकृत ई-कचरा संग्रह केंद्र बनाए जाएं। उत्पादक कंपनियां अपने बेचे हुए सामान को वापस लें और वैज्ञानिक तरीके से नष्ट करें। स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं और नगर निगम अलग से ई-कचरा उठाने की व्यवस्था करे। सबसे बड़ी बात, अवैध रूप से चल रही ढाई सौ स्क्रैप यूनिट्स पर कार्रवाई हो। छह साल में दस गुना बढ़ा ई-कचरा आने वाले वर्षों में और बढ़ेगा। यदि आज नहीं चेते तो यह प्रदूषण हमारी हवा, पानी और मिट्टी को और जहरीला करेगा। एनजीटी ने खतरे की घंटी बजा दी है। अब सरकार को जागना होगा, क्योंकि यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, आने वाली पीढ़ी की सांसों का सवाल है।














