रीवा, 2 सितंबर।
रीवा के गांधी मेमोरियल अस्पताल में कल्पना मिश्रा और उसके गर्भस्थ शिशु की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। जांच में सामने आया कि जिस ब्लड सेंटर का लाइसेंस तीन जुलाई को कमियों के कारण निरस्त कर दिया गया था, उसी सेंटर से खून लाने की सलाह अस्पताल के स्टाफ ने परिजन को दी थी। परिजन ने ढाई हजार रुपये देकर खून खरीदा। एक यूनिट खून चढ़ाना शुरू होते ही पांच मिनट में मरीज की तबीयत बिगड़ने लगी और पूरा खून चढ़ने से पहले कल्पना की मौत हो गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि लाइसेंस रद्द होने के बावजूद संबंधित ब्लड सेंटर का संचालन कैसे जारी रहा? प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? यदि समय पर सेंटर को बंद और सील कर दिया गया होता तो शायद यह त्रासदी टाली जा सकती थी। मौत के बाद दस्तावेज जब्त कर सेंटर को सील करने की कार्रवाई शुरू करना व्यवस्था की विफलता को ही उजागर करता है।
इस मामले में अस्पताल स्टाफ और निजी ब्लड सेंटर के बीच मिलीभगत की आशंका की भी जांच होनी चाहिए। सरकारी अस्पताल में ब्लड बैंक उपलब्ध होने के बावजूद परिजन को बाहर से खून लाने की सलाह क्यों दी गई? क्या इसके पीछे कमीशन का खेल था? यह गंभीर जांच का विषय है।
यह घटना बताती है कि लाइसेंस और नियमों की कागजी निगरानी पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्य विभाग को प्रदेश में लाइसेंस निरस्त किए गए सभी ब्लड बैंक और पैथोलॉजी सेंटरों का औचक निरीक्षण कर उनकी सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। अस्पतालों में भी यह सुनिश्चित किया जाए कि मरीजों को केवल अधिकृत और सुरक्षित स्रोत से ही रक्त मिले।
कल्पना मिश्रा और उसके गर्भस्थ शिशु की मौत को केवल चिकित्सकीय लापरवाही मानकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। जब लाइसेंस रद्द होने के बावजूद कोई सेंटर खून उपलब्ध करा रहा हो और अस्पताल का स्टाफ मरीज को वहीं भेज रहा हो, तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। प्रशासन को दोषियों पर सख्त कार्रवाई करनी होगी, ताकि किसी और परिवार को ऐसी त्रासदी न झेलनी पड़े।














