भोपाल, 2 सितंबर।
पहाड़ी खुदाई का मामला केवल अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता का परीक्षण भी है। एक ही जमीन को एक रिपोर्ट में शासकीय और दूसरी रिपोर्ट में निजी बताया जाना संकेत देता है कि जमीन के वर्गीकरण की प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर त्रुटि या हस्तक्षेप हुआ है। जब राजस्व अमला मौके पर पहुंचा तो पोकलेन मशीन चलती मिली। पंचनामा बना और खसरा नंबर तीन की भूमि को छोटे झाड़ का जंगल यानी शासकीय भूमि दर्ज किया गया। यह प्रत्यक्ष अवलोकन है, जो अधिक विश्वसनीय माना जाता है। लेकिन बाद में तैयार रिपोर्ट में उसी हिस्से को निजी बता दिया गया। सवाल उठता है कि बिना नए सीमांकन और ठोस दस्तावेज के जमीन की प्रकृति कैसे बदल गई? यदि जमीन पहले शासकीय थी तो निजी कैसे हुई? क्या कोई नया आदेश आया, क्या किसी ने स्वामित्व का प्रमाण दिया? यदि नहीं, तो रिपोर्ट बदलने का आधार क्या था? यह विरोधाभास प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
पहाड़ी को काटकर समतलीकरण करना केवल राजस्व का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरणीय कानून का भी विषय है। पहाड़ी क्षेत्रों में बिना अनुमति कटान करना अवैध है और यदि वह भूमि शासकीय है तो यह अतिक्रमण के साथ-साथ शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला भी बनता है। पोकलेन मशीन का जब्त होना और फिर गायब हो जाना भी जांच का विषय है। जब राजस्व अमले ने मशीन देखी तो पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन मौके पर पुलिस नहीं पहुंची और बाद में मशीन गायब हो गई। एक रिपोर्ट मौके पर बनी और दूसरी बाद में कार्यालय में तैयार हुई। यदि एक ही खसरे को दो अलग-अलग श्रेणियों में दिखाया जाएगा तो भविष्य में भूमि की खरीद-फरोख्त में धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाएगी। संबंधित अधिकारी का बाद वाली रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इनकार करना और दोबारा सीमांकन की बात कहना भी इस मामले में गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
इस पूरे मामले का समाधान केवल स्वतंत्र और तकनीकी सीमांकन से संभव है। जीपीएस और सेटेलाइट मैप के आधार पर सीमांकन कराया जाए और दोनों रिपोर्टों की तुलना की जाए। यदि शासकीय भूमि को निजी बताने की कोशिश हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और यदि निजी भूमि को गलत तरीके से शासकीय बताया गया है तो किसान या मालिक को न्याय मिलना चाहिए। पहाड़ी खुदाई पर तत्काल रोक लगाकर पर्यावरणीय क्षति का आकलन भी जरूरी है। एक जमीन के दो दावेदार केवल दो पक्षों का विवाद नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है, जिस पर नागरिक अपने भूमि अधिकारों के लिए भरोसा करते हैं।














