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संपादकीय
03 Sep, 2026

नो बीमा, नो फ्यूल - भोपाल, इंदौर, उज्जैन से शुरू होगी सड़क पर मौत रोकने की नई जंग

मध्य प्रदेश के चुनिंदा शहरों में बिना बीमा वाले वाहनों को पेट्रोल पंप पर ईंधन न देने की सख्त योजना जल्द शुरू की जाएगी।

भोपाल, 3 सितंबर।

भोपाल में अब सड़क पर दौड़ने से पहले सोचना होगा, क्योंकि बिना बीमा के गाड़ी चलाना अब केवल चालान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पेट्रोल पंप पर ही गाड़ी रोक दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑन रोड सेफ्टी ने मध्य प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि बिना बीमा वाले वाहनों को किसी भी हालत में ईंधन न दिया जाए। इस योजना को सबसे पहले भोपाल, इंदौर और उज्जैन में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जाएगा।

नो बीमा, नो फ्यूल योजना सरकार आने वाले दिनों में लागू करने जा रही है। इसके तहत सभी पेट्रोल पंपों पर आधुनिक कैमरे लगाए जाएंगे। ये कैमरे हर वाहन की नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे और तुरंत बीमा डेटाबेस से मिलान करेंगे। यदि वाहन का बीमा नहीं होगा तो पंप संचालक को अलर्ट भेजा जाएगा और उसे पेट्रोल-डीजल देने से मना करने के लिए कहा जाएगा।

यह व्यवस्था पायलट प्रोजेक्ट के तहत चुनिंदा जिलों में लागू होगी। इसके लिए ऐसे जिलों को चुना जा रहा है, जहां सबसे ज्यादा बिना बीमा वाले वाहन दौड़ रहे हैं। परिवहन विभाग के पास पहले से ही ऐसे वाहनों की सूची है और अब उन्हें कैमरे के जरिए पकड़ा जाएगा।

सरकार का दावा है कि 800 मौतें कम हुई हैं। परिवहन सचिव मनीष सिंह ने सुप्रीम कोर्ट कमेटी के सामने प्रजेंटेशन में बताया कि मध्य प्रदेश में सड़क हादसों में होने वाली मौतों को रोकने के लिए कई स्तर पर काम जारी है। 2025 के पहले छह माह की तुलना में 2026 के पहले छह माह में हुए हादसों में करीब 800 कम मौतें हुई हैं।

यह आंकड़ा बताता है कि सख्ती और जागरूकता से असर हो रहा है। हर साल औसतन 13 हजार मौतें हो रही हैं। इन्हें रोकने के लिए सरकार कई काम कर रही है। ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में वाहन चलाना और बिना हेलमेट के गाड़ी चलाना सबसे बड़े कारण हैं और इन्हीं पर सबसे ज्यादा फोकस किया जा रहा है।

कमेटी को एक और चौंकाने वाला तथ्य मिला कि घायलों को अस्पताल पहुंचाने में 16 मिनट या अधिक समय लग रहा है। इस पर कमेटी ने कड़ी आपत्ति जताई है। कहा गया कि ऐसा इंतजाम हो कि कम से कम समय में घायल को अस्पताल पहुंचाया जाए और तुरंत इलाज शुरू हो।

सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौतें खून बहने और समय पर इलाज न मिलने से होती हैं। यदि घायल को गोल्डन आवर में अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो 50 प्रतिशत जानें बचाई जा सकती हैं। इसके लिए हाईवे पर एंबुलेंस की संख्या बढ़ाने और ट्रॉमा सेंटर को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।

सड़क हादसों में कमी लाने के लिए भोपाल, इंदौर और उज्जैन में भी जीरो फेटेलिटी डिस्ट्रिक्ट यानी जेडएफडी प्रोग्राम चलाया जाएगा। इस प्रोग्राम के तहत एक जिले को जीरो मौत वाला जिला बनाने का लक्ष्य रखा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑन रोड सेफ्टी की मंत्रालय में हुई बैठक में यह बात सामने आई। शीर्ष कोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय मनोहर सप्रे ने इसकी अध्यक्षता की। यहां राज्य सरकार की ओर से सड़क सुरक्षा पर प्रजेंटेशन दिया गया।

जेडएफडी प्रोग्राम में ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए जाएंगे, जहां सबसे ज्यादा हादसे होते हैं। उन जगहों पर सड़क इंजीनियरिंग सुधारी जाएगी। स्पीड ब्रेकर, साइन बोर्ड और लाइटिंग लगाई जाएगी। साथ ही लोगों को जागरूक करने के लिए स्कूल-कॉलेजों में अभियान चलाया जाएगा।

भोपाल के ऑटोमेटिक फिटनेस सेंटर का निरीक्षण भी किया गया। एक वाहन को फिटनेस देने की प्रक्रिया देखी गई। टेक्नीशियन से पूछा गया तो जवाब संतोषजनक नहीं मिला। पता चला कि कई अनफिट वाहन भी पास किए जा रहे हैं। इस पर अध्यक्ष ने नाराजगी जताई और कहा कि फिटनेस सेंटर में पारदर्शिता जरूरी है।

भोपाल में कई ऐसे वाहन दौड़ रहे हैं, जिनकी फिटनेस खत्म हो चुकी है, लेकिन जुगाड़ से फिटनेस सर्टिफिकेट ले लेते हैं। यही वाहन सबसे ज्यादा हादसों का कारण बनते हैं। अब ऑटोमेटिक सेंटर में हर प्रक्रिया कैमरे में रिकॉर्ड होगी और डेटा सीधे परिवहन विभाग के सर्वर पर जाएगा।

बिना बीमा वाले वाहन केवल कानून का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि पीड़ित के लिए भी बड़ा खतरा हैं। यदि बिना बीमा वाला वाहन किसी को टक्कर मार देता है तो घायल को बीमा से मिलने वाली मदद नहीं मिलती है। तीसरे पक्ष का बीमा अनिवार्य है, ताकि हादसे के बाद पीड़ित परिवार को मुआवजा मिल सके।

मध्य प्रदेश में आज भी 30 प्रतिशत से ज्यादा वाहन बिना बीमा के दौड़ रहे हैं। दोपहिया वाहनों में यह संख्या और भी ज्यादा है। लोग पहले साल बीमा कराते हैं, फिर रिन्यू नहीं कराते हैं। इसी लापरवाही को रोकने के लिए पेट्रोल पंप पर ही रोक लगाने की योजना बनाई गई है।

पेट्रोल पंप पर लगा कैमरा नंबर प्लेट पढ़ेगा और वाहन डेटाबेस से बीमा की वैधता चेक करेगा। यदि बीमा फेल होगा तो पंप पर लगी स्क्रीन पर लाल सिग्नल आएगा और संचालक को पेट्रोल देने से मना करना होगा। यदि संचालक फिर भी पेट्रोल देता है तो उस पर भी जुर्माना लगेगा।

शुरुआत में लोगों को जागरूक किया जाएगा। एसएमएस भेजा जाएगा कि आपका बीमा खत्म हो गया है, उसे रिन्यू करा लें। इसके बाद सख्ती की जाएगी। इस योजना की सबसे बड़ी चुनौती पेट्रोल पंप संचालकों का सहयोग है।

कई जगह पंप संचालक विवाद से बचने के लिए बीमा न होने पर भी फ्यूल दे देते हैं। इसके लिए उन्हें कानूनी सुरक्षा देनी होगी और पुलिस का सहयोग भी जरूरी होगा।

नेटवर्क और डेटा भी चुनौती हैं। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की स्पीड कम है, वहां कैमरा सिस्टम ठीक से काम नहीं करेगा। इसके लिए ऑफलाइन सिस्टम भी विकसित किया जा रहा है।

सड़क पर अनुशासन ही जान बचाएगा। 800 मौतें कम होना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन 13 हजार मौतों का आंकड़ा अभी भी डराता है। नो बीमा, नो फ्यूल योजना केवल एक सख्ती नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि सड़क पर अनुशासन जरूरी है।

भोपाल, इंदौर और उज्जैन में पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा तो इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। फिर वह दिन दूर नहीं, जब बिना हेलमेट, बिना बीमा और बिना फिटनेस के वाहन सड़क पर दिखेंगे ही नहीं।

सड़क सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है, क्योंकि सड़क पर एक लापरवाही पूरे परिवार की जिंदगी छीन सकती है।

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