नई दिल्ली, 3 सितंबर।
वो दौर गया, जब बारहवीं के बाद सीधे अमेरिका, ब्रिटेन या कनाडा का बोर्डिंग पास ही सफलता का पैमाना माना जाता था। अब भारतीय छात्रों ने विदेश जाने की जल्दबाजी पर ब्रेक लगा दिया है। कैम्ब्रिज इंटरनेशनल एजुकेशन के ताजा सर्वे 2025-26 ने यह बड़ी तस्वीर साफ कर दी है।
रिपोर्ट कहती है कि अब 50% से ज्यादा भारतीय छात्र पहले भारत में ही पढ़ना चाहते हैं। साल 2024 में यह आंकड़ा 47% था, जबकि विदेश जाने की चाहत 42% से घटकर 40% पर आ गई है। मतलब - ग्रेजुएशन भारत में, मास्टर्स बाहर। यही नया मंत्र है।
49 देशों के 24,637 छात्रों से पूछा गया सवाल। यह सर्वे कोई छोटा सैंपल नहीं है। इसमें 49 देशों के 404 संस्थानों के 24,637 छात्र शामिल थे, जिसमें अकेले भारत के 112 संस्थान थे। नतीजा साफ है - दुनिया के सबसे पसंदीदा देश अब उतने पसंदीदा नहीं रहे।
पहले जो छात्र आंख बंद करके अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा भागते थे, अब वही हिसाब लगा रहे हैं। अमेरिका में एच-1बी की अनिश्चितता, ब्रिटेन में पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा पर संशय और कनाडा में पीआर नियमों का सख्त होना - खर्चा डबल, नौकरी हाफ।
अमेरिका में एक साल का 50 लाख रुपये का खर्च, ऊपर से आवास संकट और पार्ट टाइम जॉब की कमी ने बजट बिगाड़ दिया। नस्लीय घटनाओं और अकेलेपन ने भी पैरेंट्स को डरा दिया है। अब छात्र सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि पढ़ाई के बाद की नौकरी, करियर की लंबी सुरक्षा और मिलने वाले अवसरों को भी एक साथ तौल रहे हैं।
रिपोर्ट की सबसे दिलचस्प लाइन यही है - भारत अब अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन गया है। नई शिक्षा नीति, विदेशी यूनिवर्सिटी के इंडिया कैंपस, डीकिन, वोलोंगोंग जैसी यूनिवर्सिटी का भारत आना, चार साल की डिग्री और स्किल बेस्ड पढ़ाई ने गेम पलट दिया है।
अब छात्र को लगता है कि 40 लाख रुपये खर्च करके बाहर वही डिग्री लेने से बेहतर है कि 8-10 लाख रुपये में भारत में ही ग्लोबल लेवल की पढ़ाई कर ली जाए।
इंडिया में ग्रेजुएशन, विदेश में मास्टर्स। एक्सपर्ट इसे ब्रेन ड्रेन से ब्रेन गेन की ओर वापसी बता रहे हैं। अब ट्रेंड है - स्कूल के बाद भारत में मजबूत बेस, फिर मास्टर्स के लिए विदेश।
इससे पैसा भी बचता है, परिवार भी पास रहता है और भारतीय संस्थानों की गुणवत्ता का भी फायदा मिलता है। कोरोना के बाद यह सोच और पक्की हुई है कि ऑनलाइन ही जब विदेशी प्रोफेसर से पढ़ सकते हैं तो शुरुआत में ही इतना बड़ा खर्च क्यों करना?
विदेश जाना अब सपना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति बन गया है और उस रणनीति में पहला पड़ाव अब भारत ही है।















