नई दिल्ली, 3 सितंबर।
शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान जो दृश्य दुनिया ने देखा है, वह वैश्विक कूटनीति की दिशा तय करेगा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकातें हुई हैं।
इन मुलाकातों का लब्बोलुआब एक ही है - दुनिया में तनाव है और सभी की नजर भारत पर है। पुतिन के साथ हुई लंबी बातचीत, जिनपिंग के साथ सीमा पर स्थिरता और व्यापार संतुलन पर चर्चा तथा ईरान के राष्ट्रपति के साथ पश्चिम एशिया में शांति पर मंथन बदलते दौर का संकेत है। ईरान के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा है कि आप युद्ध रुकवाने के लिए आगे आएं। यह भारत की विश्वसनीयता का प्रमाण है।
रूस के राष्ट्रपति के साथ मुलाकात में प्रधानमंत्री मोदी ने साफ संदेश दिया कि युद्ध में बिताया हर दिन मानवता को पीछे ले जाता है। भारत ने कहा है कि यह युद्ध का युग नहीं, संवाद और कूटनीति का युग है। दोनों नेताओं ने राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष में सहयोग की समीक्षा की। रूस-यूक्रेन संघर्ष, काला सागर में संघर्ष, समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर चर्चा हुई।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात इसलिए अहम है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत-चीन संबंधों में तनाव रहा है। गलवान के बाद से भरोसा टूटा था। दोनों देश जानते हैं कि एशिया की स्थिरता के लिए साथ आना जरूरी है। सीमा पर शांति, व्यापार घाटा कम करने और वैश्विक मंचों पर सहयोग बढ़ाने पर बातचीत महत्वपूर्ण है।
ईरान के राष्ट्रपति की प्रधानमंत्री मोदी से अपील ध्यान खींचने वाली है। पश्चिम एशिया तनाव में है। ऐसे में ईरान का भारत से युद्ध रुकवाने के लिए आगे आने का आग्रह बताता है कि भारत को भरोसेमंद मध्यस्थ माना जा रहा है। भारत की ईरान के साथ ऐतिहासिक दोस्ती है और इजरायल के साथ भी मजबूत साझेदारी है। यही वजह है कि भारत दोनों पक्षों से बात कर सकता है।
भारत की वैश्विक वजनदारी अचानक नहीं बढ़ी है। इसके पीछे स्वतंत्र और दृढ़ विदेश नीति है। भारत ने किसी दबाव में अपना फैसला नहीं बदला। रूस से तेल खरीदना था तो खरीदा, अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी करनी थी तो की। इसी से भारत सभी खेमों में स्वीकार्य बना है।
भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है। डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया ने दिखाया है कि भारत केवल बाजार नहीं, समाधान देने वाला देश है। वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती देने से भी भारत की भूमिका बढ़ी है।
ऐसे समय में जब दुनिया दो खेमों में बंटी दिख रही है, भारत दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए हुए है। पुतिन मोदी की बात सुनते हैं, जिनपिंग मोदी से हाथ मिलाते हैं और ईरान के राष्ट्रपति मोदी से शांति की अपील करते हैं। भारत अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि सूत्रधार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।














