नई दिल्ली, 3 सितंबर।
कैलास मानसरोवर केवल यात्रा नहीं है, यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था है और इसी आस्था पर अब बाजार भारी पड़ रहा है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने यह सच्चाई सामने ला दी है। इस साल करीब 13,523 तीर्थयात्रियों ने यात्रा की है। बड़ी संख्या में यात्री भारत के अधिकृत मार्ग से नहीं, बल्कि नेपाल के निजी रास्ते से गए। इसी रास्ते पर कई भारतीय तीर्थयात्री लापता हुए हैं।
सवाल सीधा है - जब भारत सरकार लिपुलेख और नाथू ला जैसे पारंपरिक रास्ते दे रही है तो यात्री नेपाल के जोखिम भरे शॉर्टकट की ओर क्यों भाग रहे हैं?
सरकारी रास्ता कठिन, लेकिन भरोसेमंद है। विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित यात्रा में वैध पासपोर्ट, 18 से 70 वर्ष की आयु और शारीरिक फिटनेस अनिवार्य है। चयन कंप्यूटरीकृत ड्रॉ से होता है। मेडिकल जांच के बाद रूट और बैच का आवंटन सरकार करती है। सेना और आईटीबीपी की निगरानी होती है।
लेकिन प्रक्रिया लंबी है। ड्रॉ में नाम आने का इंतजार वर्षों तक खिंच सकता है। ओसीआई कार्डधारक और प्रवासी भारतीय इसमें शामिल नहीं हो पाते। यही कारण है कि कई लोग निजी रास्ते की ओर जाते हैं।
नेपाल वाला रास्ता आसान, लेकिन जोखिम भरा है। यह निजी टूर ऑपरेटरों के हाथ में है। बाढ़ ने दिखा दिया कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल हैं। निजी ऑपरेटरों ने कैलास को पर्यटन प्रोडक्ट बना दिया है और आस्था को पैकेज में बेच रहे हैं। सोशल मीडिया पर पांच दिन में कैलास दर्शन जैसे दावे लोगों को आकर्षित करते हैं और जल्दबाजी में जिंदगी दांव पर लग जाती है।
सरकार को लिपुलेख और नाथू ला पर बैच की संख्या बढ़ानी चाहिए तथा ड्रॉ की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए। नेपाल रूट पर जाने वाले भारतीयों के लिए अनिवार्य पंजीकरण और बीमा लागू करना होगा। निजी ऑपरेटरों के लिए संयुक्त सुरक्षा प्रोटोकॉल जरूरी है।
कैलास जाना पुण्य है, लेकिन सुरक्षित वापस आना उससे बड़ा पुण्य है। आस्था पर शॉर्टकट लेना जिंदगी से खिलवाड़ है।














