क्वेटा, 03 सितंबर।
बलोचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री नवाब असलम रायसानी ने मेहरगढ़ पर हुए हालिया ड्रोन हमले को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सैन्य अभियान के दौरान हुई इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि मेहरगढ़ केवल किसी व्यक्ति का निवास नहीं, बल्कि बलोचिस्तान की महत्वपूर्ण राष्ट्रीय, ऐतिहासिक और कबीलाई पहचान का केंद्र है।
रायसानी के अनुसार, मेहरगढ़ बलोचिस्तान की ऐतिहासिक विरासत, कबीलाई एकजुटता और शांति का प्रतीक रहा है। ऐसे स्थानों और लोगों के घरों को निशाना बनाना राष्ट्रीय तथा ऐतिहासिक धरोहर के प्रति अनादर है, जिससे समाज में आक्रोश और अविश्वास बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि मेहरगढ़ की हालिया घटना और बलोचिस्तान में बढ़ते बल प्रयोग से यह आशंका गहरी हुई है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक और लोकतांत्रिक संघर्ष के रास्तों को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना था कि राष्ट्रीय विरासत और लोगों के घरों के साथ होने वाले अपमान को इतिहास भुलाता नहीं है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने बलोच विद्रोह के पीछे भारत की भूमिका बताए जाने के आरोपों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि विद्रोह दबाव, अत्याचार और अन्याय की परिस्थितियों से जन्म लेते हैं। उनके अनुसार पेड़ काटे जा सकते हैं और नए बगीचे लगाए जा सकते हैं, लेकिन लोगों के मन में पैदा हुए अविश्वास और नफरत को ताकत के सहारे समाप्त नहीं किया जा सकता।
रायसानी ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में बलोचिस्तान में शांति स्थापित करना चाहती है तो विरोध को केवल देशद्रोह करार देने के बजाय उन मूल कारणों को समझना और दूर करना होगा, जिनके कारण लोग विरोध का रास्ता अपनाते हैं।
उन्होंने बलोचिस्तान को ऐतिहासिक भूमि बताते हुए कहा कि लगातार शक्ति के प्रयोग से परिस्थितियां और जटिल हो सकती हैं। देश और कबीलाई अधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण एवं राजनीतिक संघर्ष जारी रहना चाहिए और सरकार को बल प्रयोग के स्थान पर बातचीत तथा लोकतांत्रिक समाधान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
रायसानी ने कहा कि बलोचिस्तान के लोगों और राज्य, दोनों के हित में तनाव बढ़ाने के बजाय शांति, राजनीतिक संवाद और आपसी विश्वास का रास्ता अपनाना है। उनके अनुसार स्थायी शांति शक्ति से नहीं, बल्कि न्याय, सम्मान, राजनीतिक भागीदारी और संवाद के आधार पर ही स्थापित हो सकती है।















