नई दिल्ली, 04 सितंबर।
एक समय था जब भारत को तकनीक के मामले में केवल एक बड़ा बाजार समझा जाता था। दुनिया के देश भारत में अपना सामान बेचते थे और हम खरीदते थे। चाहे वह मोबाइल फोन हो या लैपटॉप, उसकी सबसे महत्वपूर्ण चीज यानी चिप हमेशा बाहर से आती थी।
लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। सरकार ने सेमीकॉन 2.0 योजना की अधिसूचना जारी की है और इसके लिए 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये का बजट तय किया है। यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि भारत के तकनीकी भविष्य की नई इबारत है।
सोचिए, अगर चिप भारत में बनने लगे तो क्या होगा? हमारे युवाओं को रोजगार मिलेगा, हमारा पैसा देश में रहेगा और दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत की तरफ देखेंगी।
यही सपना अब हकीकत बनने जा रहा है। सरकार का कहना है कि एक से दो वर्ष में ही दुनिया की 10 प्रतिशत चिप का निर्माण भारत में होने लगेगा। यह अपने आप में बहुत बड़ा लक्ष्य है।
76 हजार करोड़ से शुरू हुआ सफर अब 1 लाख 27 हजार करोड़ तक पहुंचाइस सफर की शुरुआत सेमीकॉन 1.0 से हुई थी। वर्ष 2022 में सरकार ने 76 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, ताकि कंपनियां भारत में निर्माण कार्य शुरू कर सकें और इसका असर दिखा भी है।
अब तक देश में तीन कंपनियां विभिन्न प्रकार की चिप का निर्माण शुरू कर चुकी हैं। यह सिर्फ शुरुआत थी। अब सेमीकॉन 2.0 के तहत इस इकोसिस्टम को और बड़ा किया जा रहा है।
केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नई दिल्ली में जानकारी देते हुए कहा कि यह योजना छह साल तक चलेगी और इसके तहत 12 कंपनियों ने भारत में निवेश के लिए अपनी दिलचस्पी दिखाई है।
यह बताता है कि दुनिया का भरोसा भारत पर बढ़ा है। कंपनियां समझ रही हैं कि भारत ही आने वाले समय का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर हब बन सकता है।
हर साल 50 से 60 हजार रोजगार और 10 लाख इंजीनियरों की वैश्विक जरूरतइस योजना का सबसे बड़ा लाभ रोजगार के रूप में मिलने वाला है। अनुमान है कि हर साल 50 से 60 हजार प्रत्यक्ष रोजगार इस सेक्टर में निकलेंगे और अप्रत्यक्ष रोजगार तो लाखों में होंगे।
चिप निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें हाई स्किल की जरूरत होती है। इसके लिए इंजीनियरों की बड़ी फौज चाहिए।
पिछले चार वर्षों में 85 हजार इंजीनियरों को इस सेक्टर के लिए प्रशिक्षित किया जा चुका है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
सरकार का अनुमान है कि 2032 तक दुनिया में सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए 10 लाख इंजीनियरों की जरूरत होगी और इसका बड़ा सप्लायर भारत ही होगा।
यानी दुनिया की चिप भारत के इंजीनियर बनाएंगे। यह युवाओं के लिए सुनहरा मौका है, जो तकनीक की दुनिया में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।
केवल चिप नहीं, पूरा इकोसिस्टम बनेगा देश मेंअक्सर लोग समझते हैं कि सेमीकंडक्टर का मतलब केवल चिप बनाना है, लेकिन हकीकत इससे बड़ी है।
सेमीकॉन 2.0 के तहत छह सेक्टर में मदद दी जाएगी। इसमें डिजाइन, मशीन, मैटेरियल, फैब सेटिंग, असेंबलिंग, टेस्टिंग और पैकेजिंग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
मतलब चिप की सोच से लेकर उसके बनने और पैक होने तक का पूरा काम भारत में ही होगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स व आईटी मंत्रालय के मुताबिक, यह रणनीति भारत को किसी एक हिस्से पर निर्भर नहीं रहने देगी।
अभी भारत मॉड्यूल बनाता है, लेकिन सेल और वेफर चीन से मंगाता है। चिप के मामले में हम यह गलती नहीं दोहराना चाहते।
हम चाहते हैं कि पॉलीसिलिकॉन से लेकर तैयार चिप तक सब कुछ भारत में बने।
ताइवान और चीन पर निर्भरता का अंतआज दुनिया की लगभग 70 प्रतिशत चिप ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन में बनती है।
कोरोना काल में जब चिप की सप्लाई रुकी तो पूरी दुनिया में गाड़ियों का प्रोडक्शन तक रुक गया था।
भारत ने इस खतरे को करीब से देखा है और वह समझ गया है कि अगर हमें आत्मनिर्भर बनना है तो चिप के मामले में भी आत्मनिर्भर बनना होगा।
सेमीकॉन 2.0 इसी आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है।
जब चिप भारत में बनेगी तो न केवल हमारी सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि हमारे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद भी सस्ते होंगे और हम दुनिया को चिप निर्यात भी कर सकेंगे।
स्टार्टअप के लिए नया आसमानइस योजना में स्टार्टअप के लिए भी बड़ा मौका है। चिप डिजाइन एक ऐसा क्षेत्र है, जहां छोटे स्टार्टअप भी बड़ा काम कर सकते हैं।
सरकार डिजाइन सेक्टर में भी मदद दे रही है। इससे देश में प्रतिस्पर्धी चिप डिजाइन इकोसिस्टम तैयार होगा और आत्मनिर्भर भारत का सपना पूरा होगा।
यह वह समय है, जब भारत केवल चिप का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता बनकर उभरेगा।
सेमीकॉन 2.0 केवल 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये की योजना नहीं, बल्कि आने वाले 20 से 30 सालों की तकनीकी स्वतंत्रता की दिशा में बड़ा कदम है।















