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संपादकीय
04 Sep, 2026

मांग से ज्यादा उत्पादन का जाल और सोलर उद्योग पर मंडराता मंदी का साया, भारत चीन की राह पर तो नहीं चल रहा

भारत में बढ़ती सोलर मॉड्यूल क्षमता और कमजोर मांग के बीच अतिरिक्त उत्पादन उद्योग के लिए संभावित मंदी की चुनौती बन रहा है।

नई दिल्ली, 04 सितंबर।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में जो छलांग लगाई है, वह दुनिया के लिए एक मिसाल है। कभी हम सोलर पैनल के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर थे। आज हम चीन के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े सोलर मॉड्यूल निर्माता बन गए हैं। यह उपलब्धि अपने आप में गर्व की बात है, लेकिन हर चमकदार सिक्के का एक दूसरा पहलू भी होता है और आज वही दूसरा पहलू सामने आ रहा है। देश में जितने सोलर मॉड्यूल बन रहे हैं, उतनी उनकी खपत नहीं हो रही है। उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो रहा है और खपत कम है। यही वह स्थिति है, जिसने कभी चीन के सोलर उद्योग को भी गहरे संकट में डाल दिया था और आज वही खतरा भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

आईईईएफए यानी इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस और जेएमके रिसर्च की ताजा रिपोर्ट ने इस खतरे की घंटी को बहुत साफ शब्दों में बजाया है। रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 तक भारत की सोलर मॉड्यूल बनाने की क्षमता 233 गीगावाट तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा हमारी घरेलू मांग से कई गुना ज्यादा है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि फैक्ट्रियां अपनी पूरी क्षमता से चल ही नहीं पा रही हैं। आज देश की अधिकतर फैक्ट्रियां केवल 35 से 40 प्रतिशत क्षमता पर काम कर रही हैं, जबकि किसी भी फैक्ट्री को मुनाफे में बने रहने के लिए कम से कम 50 से 65 प्रतिशत क्षमता पर चलना जरूरी होता है। सोचिए, एक कारखाना बना दिया, मजदूर रख लिए गए, बिजली का बिल आ रहा है, लेकिन माल आधा ही बन रहा है तो घाटा तो होगा ही। यही घाटा धीरे-धीरे मंदी में बदल रहा है।

चिंता की बात यह है कि यह संकट यहीं नहीं रुकने वाला है। बाजार में पहले से ही 135 गीगावाट की अतिरिक्त क्षमता निर्माण के अधीन है या योजना में है। मतलब, जो गोदाम पहले से भरे हुए हैं, उनमें और माल आने वाला है। अगर मांग नहीं बढ़ी तो केवल मॉड्यूल बनाने वाले छोटे निर्माताओं के कारखाने ठप पड़ जाएंगे और उनकी संपत्तियां बेकार हो जाएंगी। यह स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी कुछ साल पहले चीन में हुई थी। चीन ने इतने सोलर पैनल बना दिए कि उसे उन्हें घाटे में बेचना पड़ा और उसकी सैकड़ों छोटी कंपनियां बंद हो गईं। भारत भी अनजाने में उसी रास्ते पर चल पड़ा है।

इस संकट को और गहरा कर दिया है अमेरिका के फैसले ने। वित्तीय वर्ष 2026 में भारत के कुल सोलर मॉड्यूल निर्यात का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका को जाता था, लेकिन अमेरिका ने भारतीय सोलर उत्पादों पर 200 प्रतिशत से अधिक का आयात शुल्क लगा दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि 2024 के उच्चतम स्तर के मुकाबले अमेरिका को होने वाला निर्यात 44 से 47 प्रतिशत तक गिर गया है। भारतीय कंपनियों ने अपना सारा दांव अमेरिका पर लगा दिया था। अब वहां दरवाजा बंद होने से उनके पास माल पड़ा रह गया है। अब उम्मीद यूरोपीय संघ से है, लेकिन यूरोप में भी चीन पहले से ही बहुत कम कीमत पर माल बेच रहा है। वहां प्रतिस्पर्धा बहुत कड़ी है। इसलिए निर्यात के भरोसे इस अतिरिक्त उत्पादन को खपाना आसान नहीं होगा।

इस पूरे संकट की जड़ में एक और बड़ी नीतिगत चूक है, जिसे रिपोर्ट में बहुत विस्तार से बताया गया है। भारत ने केवल मॉड्यूल बनाने पर जोर दिया है, लेकिन मॉड्यूल के लिए जरूरी कच्चे माल पर ध्यान नहीं दिया। हमारी मॉड्यूल बनाने की क्षमता सोलर सेल बनाने की क्षमता से सात गुना ज्यादा है और इंगॉट-वेफर बनाने की क्षमता से 116 गुना ज्यादा है। इसका मतलब है कि हम सोलर पैनल की अंतिम असेंबली तो भारत में कर रहे हैं, लेकिन उसके लिए जरूरी सेल, वेफर और पॉलीसिलिकॉन आज भी चीन से आयात कर रहे हैं। यह ऐसा ही है, जैसे हम कार का कारखाना तो लगा लें, लेकिन इंजन और चेसिस चीन से मंगवाएं। चीन जब चाहे कच्चे माल की कीमत बढ़ा देता है और भारतीय कंपनियां कुछ नहीं कर पातीं। जब तक हम पूरी सप्लाई चेन यानी पॉलीसिलिकॉन से लेकर वेफर और सेल तक आत्मनिर्भर नहीं होंगे, तब तक हम सही मायने में आत्मनिर्भर नहीं कहला सकते और घाटे का यह खेल चलता रहेगा।

रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि डेटा सेंटर, ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया और निर्यात के जरिए 2030 तक 17 से 22 गीगावाट की अतिरिक्त मांग पैदा हो सकती है। लेकिन यह मांग भी 135 गीगावाट की आने वाली अतिरिक्त क्षमता के सामने बहुत छोटी है। सवाल यह है कि बाकी की 100 गीगावाट से अधिक क्षमता का क्या होगा? क्या वह ऐसे ही खाली पड़ी रहेगी या उसे घाटे में बेचना पड़ेगा?

भारत में सौर ऊर्जा की मांग बढ़ाने के लिए अभी भी कई अड़चनें हैं। बिजली वितरण कंपनियां सौर ऊर्जा खरीदने में आनाकानी करती हैं, रूफटॉप सोलर की गति बहुत धीमी है और जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया बहुत जटिल है। जब तक इन समस्याओं को हल नहीं किया जाएगा, तब तक मांग उत्पादन के बराबर नहीं आ पाएगी।

इस मंदी से कैसे बचा जाए, इस पर रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने कुछ बहुत ही व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। पहला सुझाव है कि सरकार को केवल मॉड्यूल बनाने के लिए प्रोत्साहन देने के बजाय पॉलीसिलिकॉन, वेफर और सेल बनाने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए, ताकि चीन पर निर्भरता खत्म हो सके। दूसरा सुझाव है कि भारत को पैक्स सिलिकॉन गठबंधन जैसे अंतरराष्ट्रीय समूहों में शामिल होकर कच्चे माल के स्रोतों का विविधीकरण करना चाहिए। महत्वपूर्ण सुझाव है कि सरकार को नई मॉड्यूल फैक्ट्रियों को मंजूरी देने पर कुछ समय के लिए रोक लगानी चाहिए और मौजूदा कंपनियों को अपस्ट्रीम में जाने के लिए मदद करनी चाहिए। साथ ही घरेलू मांग बढ़ाने के लिए सभी सरकारी इमारतों पर रूफटॉप सोलर अनिवार्य किया जाना चाहिए और डिस्कॉम पर सौर ऊर्जा खरीदने के लिए सख्त नियम लागू होने चाहिए।

सोलर उद्योग भारत के हरित भविष्य की रीढ़ है, लेकिन रीढ़ को भी संतुलित भोजन की जरूरत होती है। केवल एक ही हिस्से को बढ़ाते जाना और बाकी शरीर को कमजोर छोड़ देना समझदारी नहीं है। आज भारत के सोलर उद्योग को उसी संतुलन की जरूरत है। हमें संख्या नहीं, गुणवत्ता और पूरी सप्लाई चेन पर ध्यान देना होगा।

अगर हमने चीन की गलती से सबक नहीं लिया तो वह दिन दूर नहीं, जब देश के कई सोलर पार्क में ताले लटके होंगे, हजारों युवाओं का रोजगार खतरे में होगा और बैंकों का हजारों करोड़ रुपये का कर्ज डूब जाएगा। आवश्यकता से अधिक उत्पादन कभी भी तरक्की का संकेत नहीं होता, बल्कि यह आने वाली मंदी का पहला संकेत होता है और भारत के सोलर उद्योग में यह घंटी बज चुकी है।

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