नई दिल्ली, 04 सितंबर।
भारत की युवा पीढ़ी यानी जनरेशन जी के बीच करियर और शिक्षा को लेकर बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। पहले जहां युवा एक बार लक्ष्य तय कर लेते थे तो उसी पर टिके रहते थे, वहीं अब जेन जी हालात देखकर एक साल के भीतर ही अपना लक्ष्य और विचार बदल देते हैं।
बढ़ती लागत, वीजा की अनिश्चितता और पढ़ाई के बाद काम करने के सख्त नियमों के कारण भारतीय युवा अब करियर में सफलता के लिए विदेश जाने को इकलौता विकल्प नहीं मान रहे हैं।
एमिरेट्स की रिपोर्ट में यह राज खुला है। यह सर्वे भारत के प्रमुख महानगरों में 15 से 28 वर्ष के 1,010 युवाओं के बीच किया गया है, जिसमें स्कूल जाने वाले, शुरुआती करियर वाले और उच्च शिक्षा में कदम रख रहे युवाओं को शामिल किया गया है।
इस सर्वे ने यह साफ कर दिया है कि जेन जी अब प्रैक्टिकल हो गई है। वह हवा में सपने नहीं देखती, बल्कि जमीन पर रहकर फैसला लेती है।
विदेश जाने का क्रेज अब पहले जैसा नहीं रहा। युवा अब करियर में सफलता के लिए विदेश को ही अंतिम सत्य नहीं मान रहे हैं, बल्कि भारत में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा और अवसर खोज रहे हैं।
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि सर्वे में शामिल 87 प्रतिशत स्कूली छात्रों और 92 प्रतिशत कॉलेज जाने वाले युवाओं ने कहा कि वे भारत में ही स्थित किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना पसंद करेंगे।
69 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि वे वीजा की अनिश्चितताओं से बचने के लिए विदेश जाने के बजाय भारत में ही उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों को चुनेंगे।
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। पिछले दो वर्षों में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में वीजा नियम कड़े हुए हैं।
पढ़ाई के बाद वर्क परमिट में देरी हो रही है और रहने की लागत आसमान छू रही है। ऐसे में भारतीय युवा अब समझदार हो गया है।
वह सोच रहा है कि जब भारत में ही विदेशी विश्वविद्यालय आ रहे हैं तो बाहर जाकर लाखों रुपये क्यों खर्च किए जाएं।
इसी कारण भारत में पढ़ाई के साथ विदेश में एक-दो सेमेस्टर बिताने वाले हाइब्रिड कोर्स की मांग तेजी से बढ़ी है।
युवा चाहते हैं कि डिग्री भारत की हो, लेकिन एक्सपोजर विदेश का भी मिले। यह मॉडल अब सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई युवाओं की पढ़ाई और कौशल विकास का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
82 प्रतिशत युवा नई चीजें सीखने या कौशल विकसित करने के लिए सप्ताह में कम से कम एक बार जेन एआई टूल्स का उपयोग करते हैं।
अब युवा किताबों से ज्यादा एआई से सीख रहा है। वह हर हफ्ते कुछ नया सीखने के लिए एआई का सहारा ले रहा है।
चाहे वह कोडिंग हो, डिजाइनिंग हो, कंटेंट लिखना हो या फिर इंटरव्यू की तैयारी हो, एआई अब उनका पर्सनल ट्यूटर बन गया है।
पहले युवा कोर्स करने के लिए कोचिंग जाता था, अब वह एआई से पूछ लेता है।
पहले वह नोट्स बनाता था, अब एआई से समरी ले लेता है। यह बदलाव शिक्षा की पूरी परिभाषा बदल रहा है।
पिछले एक साल में युवाओं की रुचि में बड़ा बदलाव आया है। इसमें अमेरिका जाने की इच्छा में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है।
कारण साफ है। अमेरिका में एच-1बी वीजा की अनिश्चितता बढ़ी है, वहां नस्लीय हमलों की खबरें आ रही हैं और पढ़ाई के बाद नौकरी की गारंटी कम हुई है।
इसलिए युवा अब अमेरिका के बजाय भारत में ही करियर बनाना ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं।
पहले जो युवा कहते थे कि हमें किसी भी हालत में विदेश जाना है, अब वही युवा कह रहे हैं कि यदि भारत में ही अच्छा पैकेज मिल रहा है तो बाहर क्यों जाना?
जेन जी के लिए सफलता की परिभाषा भी बदल गई है। पहले सफलता का मतलब था बड़ी कंपनी में बड़ा पद और बड़ी सैलरी, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
74 प्रतिशत युवा बड़े लीडरशिप पद के बजाय वर्क-लाइफ बैलेंस को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं।
65 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि एक सफल करियर के लिए किसी कंपनी का एग्जीक्यूटिव या बड़ा अधिकारी बनना अनिवार्य नहीं है, बल्कि खुश रहना और समय पर घर जाना ज्यादा जरूरी है।
यह वही जनरेशन है, जो कहती है कि पैसा जरूरी है, लेकिन मेंटल हेल्थ उससे भी ज्यादा जरूरी है।
इसलिए वे ऐसी नौकरी पसंद करते हैं, जहां तनाव कम हो और सीखने को ज्यादा मिले।
शुरुआती करियर वाले 65 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि आज के जॉब मार्केट में सफलता के लिए सिर्फ एक डिग्री होना काफी नहीं है।
75 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए नए कौशल सीखना जरूरी है।
मतलब साफ है कि अब केवल बीए, बीकॉम या बीटेक की डिग्री से काम नहीं चलेगा। साथ में डिजिटल स्किल, कम्युनिकेशन स्किल और एआई की समझ भी होनी चाहिए।
युवा अब पूछ रहा है कि डिग्री के साथ मुझे क्या एक्स्ट्रा आता है?
यदि एक्स्ट्रा कुछ नहीं आता तो डिग्री बेकार है।
कुल मिलाकर जेन जी अब इमोशनल नहीं, प्रैक्टिकल हो गई है। वह हर हफ्ते कुछ नया सीखना चाहती है।
वह विदेश जाने के बजाय भारत में ही ग्लोबल अवसर चाहती है। वह बड़े पद के बजाय बैलेंस वाली जिंदगी चाहती है और वह डिग्री के बजाय कौशल को ज्यादा महत्व देती है।
यह बदलाव भारत के लिए अच्छा संकेत है।
यदि भारत में ही विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय और हाइब्रिड कोर्स उपलब्ध हो जाएं तो ब्रेन ड्रेन रुक सकता है और युवा भारत में रहकर ही दुनिया के लिए काम कर सकते हैं।















