भारत, 04 सितंबर।
4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। देशभर में मंदिर सजेंगे, झांकियां निकलेंगी और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल हमारे सामने भी खड़ा होना चाहिए - क्या श्रीकृष्ण केवल हमारे उत्सव और आस्था का हिस्सा हैं, या उनके विचार हमारे जीवन का भी हिस्सा बन पाए हैं? श्रीकृष्ण के विचारों का जन्म हमारे भीतर कब होगा?
संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी होकर भी श्रीकृष्ण गरीब सुदामा के पैर धोते हैं, अर्जुन का रथ हांकते हैं, पांडवों के लिए याचक बनकर जाते हैं और ग्वाल-बालों के साथ खेल में हार भी जाते हैं। उनका व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही सरल और अहंकार से मुक्त भी। यही श्रीकृष्ण हमें विवेक, साहस, करुणा और कर्तव्यबोध का पाठ पढ़ाते हैं।
दूसरी तरफ हमारी स्थिति देखिए। ठंडी चाय, देर से आए संदेश या कमजोर मोबाइल नेटवर्क जैसी छोटी बातों पर भी हमारे भीतर महाभारत छिड़ जाता है। दोस्त की नई गाड़ी देखकर ईर्ष्या, सोशल मीडिया की चमक देखकर असंतोष और दूसरों की प्रशंसा पर आहत होता झूठा स्वाभिमान हमारी रोजमर्रा की आदत बन चुके हैं। समय बदला है, लेकिन मानसिक संघर्ष वही है। हाथ में गांडीव न सही, जीवन का कुरुक्षेत्र आज भी कम नहीं है।
कहीं नौकरी और व्यापार की चिंता है, तो कहीं कर्ज, बीमारी, बिखरते रिश्ते और गिरता आत्मसम्मान। ऐसे में गीता का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
असली सवाल यह है कि जीवन रूपी कुरुक्षेत्र में हम मुश्किलों से घबराकर हथियार डाल देंगे या कर्तव्य पथ पर डटे रहेंगे? इस जन्माष्टमी पर पूजा घर में दीपक जलाने के साथ अपने भीतर भी एक दीप प्रज्वलित करने की जरूरत है। श्रीकृष्ण केवल मंदिरों की झांकियों में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, निर्णयों और कर्मों में दिखाई दें।
श्रीकृष्ण से बिखरना नहीं, निखरना सीखिएजब जीवन बार-बार परीक्षा ले और मन पूछे कि "मेरे साथ ही ऐसा क्यों?", तब श्रीकृष्ण और कर्ण का संवाद जीवन को नई दिशा देता है। कर्ण ने अपनी व्यथा गिनाई कि जन्मते ही त्याग दिया गया, सूतपुत्र कहलाया, द्रोणाचार्य ने ठुकराया, परशुराम से श्राप मिला, द्रौपदी के स्वयंवर में अपमान हुआ और कवच-कुंडल छल से छिन गए।
जब जीवन ने न्याय नहीं किया, तो संसार न्याय की अपेक्षा क्यों करता है?
श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले कि मेरा जन्म कारागार में हुआ, जन्म से पहले भाई मारे गए और जन्मते ही माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। बचपन में पूतना और बकासुर जैसे संकट आए, राजवंश में जन्म लेकर भी पालन ग्वालों के बीच हुआ।
गोकुल छूटा, मथुरा छूटी, 'रणछोड़' कहलाया और शांति के प्रयास विफल होने पर महाभारत का कलंक भी सहा। अंत में यादव वंश का विनाश और गांधारी का श्राप भी झेला। कर्ण, दुख तुमने भी सहे और मैंने भी; अंतर यह है कि तुम घाव गिनते रहे और मैं घावों के बीच भी मुस्कुराते हुए कर्तव्य पथ पर बढ़ता रहा।
हम अक्सर दूसरों की सफलता देखते हैं, उसके पीछे की नींव और संघर्ष नहीं। कठिन परिस्थितियां हमें सिखाने और मजबूत करने आती हैं। हमारा ध्यान खाली गिलास पर अधिक जाता है, जबकि अंधेरा केवल प्रकाश का अभाव है।
अंधेरे की शिकायत करने से बेहतर है कि विश्वास, कर्तव्य और दृढ़ संकल्प का दीपक जलाया जाए। जो पानी जहाज के बाहर रहता है, वह उसे तैराता है, लेकिन भीतर आते ही डुबा देता है। वैसे ही दुख और व्यथा को मन के भीतर प्रवेश नहीं करने देना चाहिए।
यदि बीज मिट्टी में दबने की शिकायत करे तो सड़ जाएगा, लेकिन सीना चीरकर बाहर निकले तो विशाल वृक्ष बनता है। प्रकृति भी यही सिखाती है - बादल फटने पर बारिश होती है, बीज टूटने पर पौधा उगता है, गेहूं पिसने पर आटा बनता है, चंदन घिसने पर सुगंध देता है, सोना आग में तपकर कुंदन बनता है और बांस छिदने के बाद ही बांसुरी बनता है।
पत्थर चोट सहकर निखर जाए तो भगवान बन जाता है और बिखर जाए तो कंकड़।
आत्मबल की शक्ति असीम है। अरुणिमा सिन्हा, बीथोवन, हेलेन केलर, स्टीफन हॉकिंग, दीपा मलिक और जेसिका कॉक्स जैसे लोगों ने कभी अपनी सीमाओं के आगे घुटने नहीं टेके।
जब भी जीवन में टूटा हुआ महसूस करें, विश्वास रखिए कि प्रकृति आपको कुछ नया सिखाकर निखारने की तैयारी कर रही है।
श्रीकृष्ण से कर्तव्य सीखिए: कर्म ही जीवन का आधार हैकर्म से कोई नहीं बच सकता। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को भी कर्म करना पड़ा। जंगल का राजा सिंह हो या समुद्र की ओर बढ़ती नदी, बिना प्रयास और गति के किसी का अस्तित्व संभव नहीं है। संभावनाएं कितनी भी बड़ी क्यों न हों, कर्म के अभाव में वे केवल कल्पना बनकर रह जाती हैं।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, क्योंकि कर्म के बिना शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता। परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन हमारी तैयारी, प्रयास और अनुशासन पूरी तरह हमारे हाथ में है।
जब श्रीराम और श्रीकृष्ण ने भी कर्म के मार्ग को अपनाया, तो हम इससे कैसे पीछे हट सकते हैं?
कुरुक्षेत्र में महाधनुर्धर अर्जुन भी दुविधा में फंस गए थे। आज हम भी उसी मोड़ पर खड़े हैं। हमें केवल अपने संकल्प, विश्वास और मनोबल का गांडीव उठाने की आवश्यकता है।
अपनी मंजिल को अर्जुन की मछली की आंख की तरह देखिए, ताकि आसपास का शोर आपको भटका न सके।
हमें रील और रियल जिंदगी के अंतर को समझना होगा। समय व्यर्थ गंवाने पर समय उसका हिसाब जरूर बराबर करता है। मान लेने से हार और ठान लेने से जीत तय होती है।
अब निर्णय हमारा है कि परिणाम के भय से गांडीव नीचे रखना है या श्रीकृष्ण के कर्मयोग से प्रेरणा लेकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ना है।
आज का महाभारत: हमारे भीतर और बाहर का संघर्षमहाभारत सिर्फ एक पौराणिक गाथा नहीं, हमारे अंतर्मन और फैसलों का रोजमर्रा का कुरुक्षेत्र भी है।
हमारे भीतर का भीष्म वह दकियानूसी सोच है, जिसे तर्क से बदलना होगा। द्रोणाचार्य वे आदरणीय परंपराएं हैं, जिनका सम्मान करते हुए भी अपने फैसले खुद लेने चाहिए। कर्ण हमारे भीतर का पुराना दर्द और हीनभावना है।
अपनी चोट को नहीं, बल्कि अपनी ताकत को पहचान बनाइए। दुर्योधन हमारा अहंकार है, शकुनि भटकाने वाली गलत सलाह, अश्वत्थामा खुद को जलाने वाला प्रतिशोध और जयद्रथ लक्ष्य से ठीक पहले की वह बाधा है, जिसे केवल एकाग्रता और पक्के इरादे से भेदा जा सकता है।
अभिमन्यु सिखाता है कि केवल जोश नहीं, पूरी तैयारी और ज्ञान जरूरी है। युधिष्ठिर आगाह करते हैं कि जहां खेल के नियम ही गलत हों, वहां से समय रहते हट जाना ही बुद्धिमानी है।
धृतराष्ट्र वह अंधा मोह है, जो अपनों की कमियों पर पर्दा डालता है, जबकि विदुर अंतरात्मा की वह सच्ची आवाज है, जो कड़वी होकर भी सही राह दिखाती है।
यदि हम आज के अर्जुन हैं, तो हमारी काबिलियत हमारा गांडीव है, ज्ञान तीर, तजुर्बा कवच और विवेक ही हमारा श्रीकृष्ण है। हर बात पर टकराव ठीक नहीं, पहले शांति और संवाद चुनना चाहिए।
लेकिन जब बात आत्मसम्मान और सत्य की हो, तो अपने विवेक के साथ पूरी निडरता से खड़े होना चाहिए।
इस जन्माष्टमी जब हम श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएं, तो केवल कारागार के द्वार खुलने की कथा न सुनें। अपने भीतर का कोई ऐसा बंद द्वार भी खोलें, जहां से कृष्ण-चेतना का प्रकाश हमारे विचारों, व्यवहार और कर्मों में प्रवेश कर सके।
यही जन्माष्टमी का सबसे सार्थक उत्सव होगा।














