सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष जस्टिस अभय मनोहर सप्रे ने समीक्षा बैठक में अधिकारियों से कहा कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन रोकने के साथ रोड इंजीनियरिंग में तत्काल सुधार किए जाएं।
आपके लिए हादसे में मौत एक आंकड़ा हो सकती है, लेकिन किसी परिवार के लिए यह जिंदगी उजाड़ देने वाली त्रासदी है। 2024 और 2025 में सड़क हादसों में हुई मौतों का ग्राफ बढ़ा है।
इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में एक भी सड़क दुर्घटना में मौत न हो, इसका लक्ष्य रखा गया है। लक्ष्य बड़ा है, लेकिन हकीकत यह है कि शहरों में हर दिन सड़क हादसों में जान जा रही है।
सड़क सुरक्षा केवल गड्ढों और सिग्नल तक सीमित नहीं है। यह रोड इंजीनियरिंग, ट्रैफिक मैनेजमेंट, प्रवर्तन और जनजागरूकता का समन्वय है।
'ब्लैक स्पॉट' और 'फैटलिटी डिस्ट्रिक्ट' दो अलग-अलग चेतावनियां हैं। ब्लैक स्पॉट वह जगह है, जहां बार-बार हादसे होते हैं, जबकि फैटलिटी डिस्ट्रिक्ट वह जिला है, जहां मौतों का आंकड़ा अधिक है।
रोड इंजीनियरिंग सुधारे बिना केवल हेलमेट के चालान से मौतें नहीं रुकेंगी। अच्छी शुरुआत है कि चर्चा चालान से आगे बढ़कर ब्लैक स्पॉट के चिन्हांकन और सुधार पर हो रही है।
हर साल सड़क सुरक्षा समिति की बैठक होती है, निर्देश जारी होते हैं और फिर अगले साल वही सवाल खड़ा हो जाता है।
अब जरूरत है कि हर ब्लैक स्पॉट पर सुधार की समयसीमा और जिम्मेदारी तय हो, इंजीनियरिंग ऑडिट अनिवार्य किया जाए और स्कूल-कॉलेजों में सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।
नौ जिलों को फैटलिटी डिस्ट्रिक्ट घोषित करना प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं, सामाजिक चेतावनी भी है।
सड़क दुर्घटनाओं को किस्मत नहीं, सिस्टम की खामी मानकर सुधारना होगा। तभी मौतों का आंकड़ा घटेगा।














