भोपाल, 04 सितंबर।
देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सड़कों पर दिख रहा आक्रोश सीधे मुख्यमंत्री या मंत्री के खिलाफ होता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जनता के सामने चेहरा उन्हीं का होता है।
लेकिन क्या इस अव्यवस्था के असली जिम्मेदार केवल राजनीतिक नेतृत्व हैं?
गहराई से देखें तो नीति बनाना सरकार का काम है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना ब्यूरोक्रेसी का दायित्व है और ब्यूरोक्रेसी को लीड करता है आईएएस कैडर। सरकारें हर पांच साल में अपना क्रेडिबिलिटी टेस्ट देती हैं, जनता नाराज होती है तो सरकार बदल देती है, लेकिन सचिवालय से लेकर कलेक्ट्रेट तक बैठे चेहरे नहीं बदलते।
स्कूल की दीवारें गिरें, अस्पतालों में डॉक्टर न हों या दफ्तरों में बिना पैसे के फाइल न चले, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? कलेक्टर, सचिव और मुख्य सचिव - ये सभी लोकसेवक हैं, लेकिन क्या इनके आचरण में सेवक नजर आता है?
एक कड़वा सच यह भी है कि सरकार का कोई आदेश तब तक जमीन पर नहीं उतरता, जब तक उस पर संबंधित अधिकारी की प्रक्रिया और मंजूरी पूरी न हो। अखिल भारतीय सेवा इसलिए बनाई गई थी कि वह राजनीतिक दबाव के आगे रीढ़ सीधी रखे और जनहित को सर्वोपरि रखे।
लेकिन जब अच्छी पोस्टिंग, राजधानी में टिके रहने और निजी नजदीकियों के लिए ब्यूरोक्रेसी झुकने लगे तो उसकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मध्य प्रदेश के भोपाल और उज्जैन में छात्र स्कूलों की अव्यवस्था के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। झारखंड में परीक्षाओं में गड़बड़ी के मामलों में वर्तमान और पूर्व सिविल सर्वेंट तक गिरफ्तार हुए हैं। यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है।
रहवासी इलाकों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति भी सिस्टम की जिम्मेदारी है। नियमों की अनदेखी का खामियाजा बाद में आम नागरिक और व्यापारी भुगतते हैं।
आईएएस बनना उपलब्धि है, लेकिन सार्थकता तब है जब आम आदमी आपके काम से आपको याद करे। एसी कमरों और प्रोटोकॉल की दीवारों के पीछे बैठी ब्यूरोक्रेसी को अब जनता के बीच जाना होगा।
राजनीतिक नेतृत्व पांच साल बाद जनता के बीच चला जाएगा, लेकिन सिस्टम को यहीं रहना है। इसलिए समय आत्ममंथन का है। सुधार का दायित्व और नेतृत्व दोनों ही ब्यूरोक्रेसी का है।














