काठमांडू, 04 सितंबर।
नेपाल में प्राकृतिक आपदा अब अपवाद नहीं, परंपरा बनती जा रही है। 1993 में आई सबसे बड़ी आपदा ने देश को हिलाकर रख दिया था। उसके बाद 2008, 2012, 2014, 2017, 2019, 2024 और अब 26 अगस्त 2025 की त्रासदी ने साबित कर दिया है कि प्रकृति से खिलवाड़ और सरकारों की अनदेखी लगातार इस हिमालयी देश को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर रही है।
हर बार बारिश आती है, पहाड़ दरकते हैं, नदियां उफान पर आती हैं और गांव के गांव बह जाते हैं। हर बार राहत के वादे होते हैं, जांच समितियां बनती हैं, लेकिन अगली बरसात में फिर वही मंजर सामने होता है। आखिर नेपाल में यह चक्र क्यों नहीं टूट रहा है?
1993 का काला साल, जब देश थम गया था
1993 की बाढ़ को नेपाल आज भी नहीं भूला है। उस साल मध्य नेपाल में लगातार मूसलाधार बारिश ने नारायणी, बागमती और कोसी नदियों को विकराल बना दिया था। सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी, हजारों घर बह गए थे, पुल टूट गए थे और सड़कें खत्म हो गई थीं।
काठमांडू घाटी का संपर्क तराई से कई दिनों तक कटा रहा था। विशेषज्ञों का मानना था कि यह सौ साल की सबसे बड़ी आपदा थी। सरकार ने उस समय कहा था कि अब ऐसी पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस योजना बनेगी, लेकिन वह योजना फाइलों में ही सिमट कर रह गई।
हर आपदा ने नया घाव दिया।
2008 में कोसी बैराज टूटने से पूर्वी नेपाल और बिहार में भारी तबाही हुई थी। लाखों लोग विस्थापित हुए थे। 2012 में सेती नदी में अचानक आई बाढ़ ने पोखरा के पास कई बस्तियां उजाड़ दी थीं।
2014 में सिंधुपालचोक में भूस्खलन ने पूरी पहाड़ी को ही निगल लिया था। सैकड़ों लोग मलबे में दब गए थे। 2017 में तराई में आई बाढ़ ने नेपाल के लगभग 80 प्रतिशत जिलों को प्रभावित किया था। 35 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे।
2019 में बारा और पर्सा में आए आंधी-तूफान ने सैकड़ों घरों को तिनके की तरह उड़ा दिया था। 2024 में फिर मेलम्ची और हेलम्बू क्षेत्र में बाढ़ और भूस्खलन ने वही पुरानी यादें ताजा कर दी थीं।
26 अगस्त की भयावहता ने सबको हिलाया
और अब 26 अगस्त की घटना ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। रसुवा और तिब्बत सीमा के पास भोटेकोशी नदी में अचानक आई भीषण बाढ़ ने नेपाल और चीन को जोड़ने वाला ऐतिहासिक फ्रेंडशिप ब्रिज भी बहा दिया।
इस दौरान 9 लोगों की मौत और 24 लोगों के लापता होने की खबर है। चीन के 11 नागरिकों समेत 28 लोग अभी भी संपर्क से बाहर हैं। 33 से अधिक लोग घायल हैं।
जानकारी के अनुसार, तिब्बत में भारी बारिश के बाद ल्हासा नदी का जलस्तर बढ़ा और उसका असर नेपाल में देखने को मिला।
इससे पहले 1980 में कोसी नदी के विकराल रूप ने निचले तराई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कटान और जलभराव की स्थिति पैदा कर दी थी। यही नहीं, 1985 और 1987 के दौरान सुनकोशी बेसिन क्षेत्र में हुई भीषण मानसूनी बारिश और भूस्खलन के कारण नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से काफी ऊपर चला गया था।
प्रकृति से खिलवाड़ है सबसे बड़ी वजह
नेपाल में बार-बार आपदा क्यों आ रही है? पहला कारण है प्रकृति से बेतहाशा छेड़छाड़। हिमालय की गोद में बसे इस देश में अंधाधुंध पेड़ों की कटाई हो रही है। सड़कों के निर्माण के नाम पर पहाड़ों को काटा जा रहा है। नदियों के किनारे अतिक्रमण बढ़ रहा है। बालू और गिट्टी का अवैध खनन हो रहा है।
जब पहाड़ नंगे होंगे तो मिट्टी कैसे रुकेगी? जब नदियों का रास्ता रोका जाएगा तो बाढ़ कैसे नहीं आएगी?
वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा बढ़ रहा है, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
जलवायु परिवर्तन और कमजोर तैयारी
जलवायु परिवर्तन नेपाल का तापमान वैश्विक औसत से अधिक तेजी से बढ़ा रहा है। इससे कम समय में अधिक बारिश हो रही है, जिसे क्लाउड बर्स्ट कहा जाता है। 1993 में भी यही हुआ था और 26 अगस्त को भी यही पैटर्न दिखा।
तीसरा कारण है चेतावनी प्रणाली की विफलता। नेपाल में मौसम विभाग और जल विज्ञान विभाग के पास आधुनिक रडार और सेंसर नहीं हैं। चीन की ओर से पानी छोड़ने या बाढ़ की जानकारी समय पर नहीं मिलती।
26 अगस्त की घटना में भी चीन ने 45 मिनट की देरी से सूचना दी थी, वह भी तब जब बाढ़ नेपाल में प्रवेश कर चुकी थी।
सरकारों की लापरवाही और नीति का अभाव
सरकारों की इच्छाशक्ति की कमी भी बड़ी समस्या है। नेपाल में हर कुछ साल में सरकार बदल जाती है। हर नई सरकार पुरानी योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल देती है। आपदा प्रबंधन के लिए स्थायी नीति नहीं है।
बजट का बड़ा हिस्सा राहत में खर्च होता है, रोकथाम में नहीं। नदियों के किनारे बसे लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाने की योजना अधूरी है। भवन निर्माण संहिता का पालन नहीं होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बिना वैज्ञानिक अध्ययन के घर बना दिए जाते हैं।
अब क्या करने की जरूरत है
नेपाल को इस चक्र को तोड़ना होगा। सबसे पहले हिमालय क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण पर रोक लगानी होगी। वृक्षारोपण को अभियान बनाना होगा। नदियों के प्राकृतिक बहाव को बहाल करना होगा।
दूसरा, आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना होगा। हर प्रमुख नदी पर जलस्तर मापक यंत्र और सायरन लगाने होंगे। चीन और भारत के साथ जल सूचना साझा करने के समझौते को मजबूत करना होगा।
तीसरा, आपदा प्रबंधन को केवल राहत एजेंसी नहीं, बल्कि रोकथाम एजेंसी बनाना होगा। स्कूली पाठ्यक्रम में आपदा प्रबंधन को शामिल करना होगा। गांव-गांव में स्वयंसेवकों की टीम बनानी होगी।
नेपाल प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत, लेकिन आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील देश है। यहां हर साल मानसून तबाही लेकर आता है। 1993 से 2025 तक का इतिहास यही बताता है कि यदि अब भी नहीं चेते तो अगली आपदा और भी भयावह होगी।
26 अगस्त की भयावहता ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करो और वैज्ञानिक सोच के साथ विकास करो। तभी नेपाल बार-बार की त्रासदी से बच सकेगा।














