भोपाल, 04 सितंबर।
प्रदेश की जेलों में आज भी 1894 का कानून चल रहा है। सोचिए, आजादी के 78 साल बाद भी हम अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था से बंधे हैं। मध्य प्रदेश ने 2024 में नया सुधारात्मक सेवा एवं बंदीगृह अधिनियम बनाया था, लेकिन दो साल बाद भी यह कानून लागू नहीं हो सका है। वजह है नियमों की मंजूरी का इंतजार।
विधानसभा ने जुलाई 2024 में कानून पारित किया था और राज्यपाल की मंजूरी 6 अगस्त 2024 को मिल गई थी। इसके बाद नियम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। जेल विभाग के अनुसार नियमों का मसौदा तैयार कर भेजा गया है। अब इसे राज्य सरकार के स्तर पर विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। फिर विधि विभाग की जांच और वरिष्ठ सचिव समिति की प्रक्रिया पूरी होगी। इसके बाद नियम मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजे जाएंगे। स्वीकृति के बाद राजपत्र में अधिसूचना जारी होने पर ही कानून प्रभावी हो सकेगा।
नया कानून अंग्रेजी शासनकाल के कारागार अधिनियम 1894, बंदी अधिनियम 1900 और बंदियों के स्थानांतरण अधिनियम 1950 की जगह लेगा। इसका उद्देश्य जेलों को केवल सजा भुगतने की जगह सुधार और पुनर्वास केंद्र के रूप में विकसित करना है।
नए कानून में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अदालत में पेशी, परिवार से वीडियो माध्यम से मुलाकात, दूरस्थ चिकित्सा सुविधा और मोबाइल निष्क्रिय करने जैसी आधुनिक व्यवस्थाओं का प्रावधान है। ट्रांसजेंडर बंदियों के लिए विशेष प्रावधान, खुली जेलों को बढ़ावा, अच्छे आचरण पर पैरोल और निशुल्क कानूनी सहायता भी इसमें शामिल हैं। लेकिन ये सुविधाएं अभी कागज पर ही हैं, क्योंकि नियम अटके हुए हैं।
जब कानून बन गया तो नियम बनाने में दो साल क्यों लग रहे हैं? देश के कई राज्यों ने अपने जेल नियम पहले ही बना लिए हैं। मध्य प्रदेश में ही हर काम में देरी क्यों होती है?
जेल विभाग कहता है कि उसने मसौदा भेज दिया है, अब सरकार की प्रक्रिया बाकी है। सरकार कहती है कि विधि विभाग देख रहा है। इस फाइल के चक्कर में हजारों कैदी आज भी पुरानी व्यवस्था में हैं।
खुली जेल का विचार इसलिए महत्वपूर्ण है कि अच्छे आचरण वाले कैदियों को जेल से बाहर काम करने का मौका मिलता है। वे परिवार के साथ रहकर समाज में वापस लौटने की तैयारी कर सकते हैं। इससे जेलों पर भीड़ कम होगी और कैदी सुधरकर समाज का हिस्सा बनेंगे। लेकिन जब तक नियम नहीं बनेंगे, तब तक खुली जेलें नहीं बनेंगी और सुधार का यह सपना सपना ही रहेगा।
देश की अदालतें कई बार कह चुकी हैं कि जेलें सुधार गृह होनी चाहिए, सजा गृह नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि कैदियों के मानवाधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
नया कानून इसी सोच पर बना है, लेकिन कानून बनाकर उसे अलमारी में बंद कर देना उस सोच का अपमान है। यदि सरकार सच में जेल सुधार चाहती है तो उसे तेजी दिखानी होगी। दो साल का समय नियम बनाने के लिए बहुत है।
इसलिए मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप कर नियमों को जल्द मंजूरी दिलानी चाहिए। जेल विभाग और विधि विभाग 30 दिन के अंदर नियमों को अंतिम रूप दें, मंत्रिमंडल में इसे प्राथमिकता से रखा जाए और एक-दो जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर खुली जेल शुरू की जाए। वीडियो मुलाकात की सुविधा भी तुरंत शुरू हो।
जेल सुधार केवल ईंट और सीमेंट का सुधार नहीं, सोच का सुधार है। यदि कैदी को सुधरा हुआ नागरिक बनाकर समाज में भेजेंगे तो अपराध कम होगा। नया कानून इसी सोच को बदलने आया है, लेकिन फिलहाल फाइलों की कैद में है। सरकार को इसे जल्द आजाद करना होगा, तभी मध्य प्रदेश में सच में सुधारात्मक व्यवस्था लागू हो पाएगी।














