मध्य प्रदेश में एक विभाग ऐसा भी है, जिसने विज्ञान को ही फेल कर दिया है। भौतिकी कहती है, एक व्यक्ति एक समय पर एक ही जगह हो सकता है, लेकिन नापतौल विभाग कहता है, हमारा अफसर एक ही दिन में इंदौर में भी है और सागर में भी।
ये विभाग तराजू से अनाज नहीं, सरकार को तोल रहा है। 13 संभाग, 13 कार्यालय और उन कार्यालयों में जमे हुए कुछ ऐसे अमर पात्र, जिन्हें देखकर लगता है कि तबादला नाम का शब्द इनकी सर्विस बुक में छपा ही नहीं है।
कोई तीन साल से, कोई पांच साल से एक ही मलाईदार कुर्सी पर ऐसा जमा है, जैसे फेविकोल से चिपकाया हो। अंगद का पैर और साहब की कुर्सी - दोनों को हिलाना असंभव।
विभाग में कहावत चलती है कि इंस्पेक्टर बनो तो कमाई है, सहायक नियंत्रक बनो तो सिर्फ फाइलें हैं। तो हमारे चतुर अफसरों ने इसका भी जुगाड़ निकाल लिया।
प्रमोशन लेकर सहायक नियंत्रक, उप नियंत्रक बन गए, क्लास-2 का रुतबा ले लिया, लेकिन इंस्पेक्टर वाली क्लास-3 की कुर्सी नहीं छोड़ी।
अब एक ही आदमी दो-दो पदों पर है। सुबह साहब के तौर पर इंस्पेक्टरों की निगरानी करनी है और शाम को खुद ही इंस्पेक्टर बनकर पेट्रोल पंप की नोजल और किराने की दुकान का बाट चेक करने निकल जाना है।
मतलब निगरानी करने वाला और निगरानी करवाने वाला दोनों एक ही। खुद ही चोर, खुद ही थानेदार।
इंदौर से सागर 350 किलोमीटर है। आम आदमी के लिए यह सात घंटे का सफर है, लेकिन विभाग के खेमराज चौधरी जैसे अफसरों के लिए यह महज एक हस्ताक्षर की दूरी है।
फाइल पर यहां साइन किया और निरीक्षण वहां हो गया। इसे प्रबंधन नहीं, जादू कहते हैं।
ये नापतौल है या वसूली का पेटेंट मॉडल?जो लोग विभाग को नहीं जानते, उन्हें बता दें कि नापतौल का इंस्पेक्टर ही असली खिलाड़ी है। उसका सीधा संपर्क व्यापारी से, राशन दुकान से, पेट्रोल पंप से, फैक्ट्री से है।
जहां सीधा संपर्क, वहां ‘ऊपरी संपर्क’ के रास्ते भी सबसे चौड़े।
इसीलिए कोई भी प्रमोशन लेकर ऊपर जाना नहीं चाहता। सबको नीचे वाली मलाई ही चाहिए। उप नियंत्रक का काम है 4-5 जिलों के इंस्पेक्टरों पर नजर रखना, लेकिन जब नजर रखने वाला खुद ही वसूली की लाइन में लग जाए तो सिस्टम को कौन नापेगा?
सरकार नियम बनाती है कि एक जगह तीन साल से ज्यादा कोई नहीं रहेगा। विभाग में इस नियम को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है।
मलाईदार जिले चिन्हित हैं - इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर। यहां पोस्टिंग मिल गई तो समझो लॉटरी लग गई।
फिर अंगद की तरह पैर जमा लो, कोई माई का लाल हिला नहीं सकता। क्यों हिलेगा? ऊपर तक तोल-मोल सेट है।
एक अफसर, चार-चार चार्ज - विभाग है या लंगर?एक और अद्भुत आविष्कार सामने आया है। एक अफसर पर चार-चार चार्ज, मतलब एक ही आदमी चार जिलों का भाग्यविधाता।
सुबह एक जिले में, दोपहर दूसरे में, शाम तीसरे में। ये इंसान है या सरकारी जीप?
और मजे की बात है, ये सब कागजों पर चल रहा है। कागज पर निरीक्षण हो रहा है, कागज पर ही कांटे सीधे हो रहे हैं और कागज पर ही जनता को न्याय मिल रहा है।
जमीन पर तो सिर्फ एक ही चीज सीधी हो रही है - साहब की जेब।
असली खेल तब समझ आता है, जब आप देखते हैं कि ये चार्ज उन जिलों के हैं, जो 350 किलोमीटर दूर हैं।
वहां की जनता शिकायत करे भी तो किससे करे? साहब तो कभी आते ही नहीं और फाइल कहती है, साहब तो रोज निरीक्षण पर हैं।
साहब का तराजू - जनता के लिए टेढ़ा, खुद के लिए सीधानापतौल विभाग का मूल मंत्र है - जनता को सही तौल मिले, कोई व्यापारी कम न तोले।
लेकिन यहां तो विभाग का खुद का तराजू ही गड़बड़ है। एक पलड़े में नियम-कानून, ईमानदारी और दूसरे पलड़े में मलाईदार पोस्टिंग, ऊपरी कमाई और अंगद की तरह जमे रहने की जिद।
और हर बार दूसरा पलड़ा भारी निकल रहा है।
जब तक विभाग में ये ‘वन मैन डबल पोस्ट’ का फॉर्मूला चलेगा, तब तक न नाप सही होगी, न तोल।
सरकार को चाहिए कि इन अंगद के पैरों को उखाड़े, 13 संभागों में लॉटरी सिस्टम से पोस्टिंग करे, एक साल से ज्यादा किसी को एक जिले में न रहने दे और सबसे जरूरी, जो अफसर क्लास-2 में प्रमोट हो गया है, उससे क्लास-3 की कुर्सी तुरंत खाली करवाए।
नहीं तो ये विभाग नापतौल कम, तोल-मोल विभाग ज्यादा कहलाएगा, जहां अफसर 350 किलोमीटर दूर बैठकर भी आपकी दुकान का बाट टेढ़ा बता देगा और आप कुछ नहीं कर पाएंगे।















