देश में सड़क हादसे अब हादसे नहीं, बल्कि एक रोजमर्रा की त्रासदी बन गए हैं। लापरवाही धीरे-धीरे लोगों की जान लील रही है और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारे पास नियमों की कोई कमी नहीं है। गति सीमा तय है, हेलमेट और सीट बेल्ट अनिवार्य है, भारी वाहनों के लिए पार्किंग की जगह निर्धारित है और हाईवे किनारे अतिक्रमण रोकने के लिए स्पष्ट कानून है। फिर भी हादसे रुक नहीं रहे। इससे एक बात साफ होती है कि समस्या नियमों की कमी नहीं, बल्कि नियमों को मानने और मनवाने की इच्छाशक्ति की कमी है। जब कागज पर लिखे सख्त नियम सड़क पर कमजोर पड़ जाते हैं तो वे सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।
हाईवे पर मौत का सबसे बड़ा कारण है तेज रफ्तार और एक-दूसरे से आगे निकलने की अंधी होड़। निर्धारित गति सीमा को ताक पर रखकर वाहन दौड़ाना, बिना इंडिकेटर के अचानक लेन बदल लेना, गलत साइड से ओवरटेक करना और दो वाहनों के बीच मामूली सी जगह में कट मारना अब आम दृश्य है। चालक को लगता है कि 10 मिनट बचाने के लिए थोड़ी तेज चलाने में क्या हर्ज है। लेकिन यही 10 मिनट कई बार पूरे परिवार के लिए जिंदगी भर का पछतावा बन जाता है। तेज रफ्तार में गाड़ी पर नियंत्रण कम हो जाता है। एक छोटा सा गड्ढा, अचानक ब्रेक या टायर फटना भी बड़ी दुर्घटना में बदल सकता है।
इसमें केवल चालक की जान नहीं जाती, हाईवे पर चल रहा हर निर्दोष व्यक्ति उस एक लापरवाह चालक की सजा भुगतता है। एक बस चालक की गलती से 40 जिंदगियां खतरे में पड़ जाती हैं। एक ट्रक का गलत ओवरटेक सामने से आ रही छोटी कार को खत्म कर देता है। हाईवे कोई रेस ट्रैक नहीं है। गति सीमा वैज्ञानिक आधार पर तय होती है। सड़क के मोड़, ढलान और ट्रैफिक को देखकर उसे तोड़ना इंजीनियरिंग को चुनौती देना है।
हाईवे की दूसरी सबसे बड़ी समस्या सड़क किनारे अतिक्रमण और अवैध पार्किंग है। जिस सड़क पर गाड़ियों को 80-100 की गति से सुरक्षित चलना चाहिए, उसी के किनारे खतरे खड़े कर दिए गए हैं। बिना लाइट के खड़े ट्रक, सड़क तक फैले हुए ढाबे और दुकानें, अवैध बोर्ड और सड़क की जमीन पर बने निर्माण, ये सब यातायात की जगह और चालक की दृश्यता दोनों छीन लेते हैं।
रात के अंधेरे में बिना रिफ्लेक्टर और बिना पार्किंग लाइट के खड़ा एक भारी ट्रक पीछे से आ रहे चालक के लिए मौत की दीवार बन जाता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 30 प्रतिशत घातक हाईवे हादसे खड़े वाहनों से टकराने के कारण होते हैं। ट्रक चालक थक जाते हैं और जहां जगह मिली, वहीं ट्रक खड़ा कर सो जाते हैं, क्योंकि सुरक्षित और निर्धारित ट्रक पार्किंग की भारी कमी है।
यहां सिर्फ चालक को दोष देना सही नहीं है। प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि हर 50 किलोमीटर पर साफ-सुथरा विश्राम स्थल, रोशनी वाली पार्किंग, शौचालय और भोजन की सुविधा हो। जब तक विकल्प नहीं देंगे, तब तक केवल चालान से समस्या हल नहीं होगी।
कैमरे लगे हैं, देखने वाला कोई नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में टोल प्लाजा पर कैमरे लगाकर हाईवे की निगरानी और अलग निगरानी कक्ष बनाने का सवाल उठाया है। यह एक बहुत जरूरी टिप्पणी है। आज लगभग हर टोल पर और कई हाईवे पर सीसीटीवी लगे हैं, लेकिन उन्हें देखने वाला, उनका डेटा एनालाइज करने वाला और तुरंत कार्रवाई करने वाला सिस्टम बहुत कमजोर है। कैमरा लगाना पहला कदम है, अंतिम नहीं। असली व्यवस्था वह है, जहां कैमरा 24 घंटे मॉनिटर हो, तेज रफ्तार वाहन की नंबर प्लेट ऑटोमैटिक कैप्चर हो और उसका ई-चालान सीधे उसके घर पहुंचे। यदि टोल प्लाजा पर ही यह पता चल जाए कि गाड़ी पिछले 100 किलोमीटर में औसत गति से तेज आई है तो वहीं उसे रोका और समझाया जा सकता है।
आज चालक जानता है कि 300 किलोमीटर तक कोई रोकने वाला नहीं है। वह 140 की स्पीड में चलता है और टोल से पहले स्पीड कम कर लेता है। अगर पूरे हाईवे पर स्पीड गन, इंटरसेप्टर और ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रीडर का जाल हो तो ही डर पैदा होगा। निगरानी ऐसी होनी चाहिए कि नियम तोड़ने वाला बच न सके और ड्यूटी में लापरवाही करने वाले अधिकारी की भी जवाबदेही तय हो।
हेलमेट और सीट बेल्ट चालान से बचने के लिए नहीं हैं। हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर लोगों की सोच अभी भी गलत है। बहुत से लोग इसे पुलिस से बचने का साधन समझते हैं, जीवन बचाने का नहीं। बाइक पर पीछे बैठा व्यक्ति अक्सर हेलमेट नहीं लगाता। कार में पीछे बैठे लोग सीट बेल्ट को जरूरी नहीं समझते।
सही हेलमेट से सिर में गंभीर चोट का खतरा 40 प्रतिशत तक कम हो जाता है और सीट बेल्ट से कार हादसे में मौत का खतरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है। ये छोटे-छोटे कवच ही हमें बड़ा हादसा होने पर भी जिंदा बचा सकते हैं। इसे आदत बनाना होगा, बोझ नहीं।
हर साल प्रशासन ब्लैक स्पॉट यानी ऐसे स्थान, जहां बार-बार हादसे होते हैं, की सूची बनाता है। बोर्ड लगा दिया जाता है कि यह दुर्घटना संभावित क्षेत्र है, लेकिन क्या केवल बोर्ड लगा देने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
अगर एक ही मोड़ पर 10 हादसे हो रहे हैं तो वहां इंजीनियरिंग में कमी है। वहां क्या साइन बोर्ड छोटा है? क्या रात में लाइट नहीं है? क्या स्पीड ब्रेकर या रंबल स्ट्रिप की जरूरत है? क्या सड़क का ढलान गलत है? इन कारणों को खोजकर स्थायी रूप से ठीक करना ही असली समाधान है। ब्लैक स्पॉट सुधार के लिए अलग बजट, तय समय-सीमा और जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
हाईवे पर सुरक्षा तीन चीजों से मिलकर बनती है - अच्छी आदत, अच्छी व्यवस्था और सख्त इच्छाशक्ति। जनता को अपनी आदत बदलनी होगी। तेज रफ्तार, गलत ओवरटेक, नशे में गाड़ी चलाना और हेलमेट-सीट बेल्ट की अनदेखी छोड़नी होगी। सरकार को अपनी व्यवस्था सुधारनी होगी - अच्छी डिजाइन वाली सड़कें, साफ संकेतक, पर्याप्त रोशनी, सुरक्षित पार्किंग और 24 घंटे कैमरा निगरानी।
नियमों का पालन जब सख्ती से होगा, तभी हाईवे सुरक्षित होंगे। याद रखिए, हाईवे पर आपकी एक छोटी सी गलती केवल आपका चालान नहीं कटवाती, बल्कि किसी परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ सकती है। इसलिए स्पीड नहीं, सुरक्षा को चुनिए।















