नई दिल्ली, 7 सितंबर।
देश में संसाधनों की कमी है, इसलिए विकास धीमा है, लेकिन यह आधा सच है। संसाधन तो हैं, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। आजादी के बाद हमने बड़े बांध बनाए, बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं, अंतरिक्ष तक पहुंचे, लेकिन एक अदृश्य दीवार हमारे सामने हमेशा खड़ी रही और वह दीवार है भ्रष्टाचार की। यह दीवार ईंट और सीमेंट की नहीं, बल्कि नोट और नीयत की बनी हुई है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग को पिछले साल 70 हजार से अधिक शिकायतें मिलीं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस बात की चेतावनी है कि आम आदमी अब चुप नहीं रहना चाहता। वह बोलना चाहता है। बैंक में कर्ज के लिए, रेलवे में बुकिंग के लिए, नगर निगम में नक्शा पास कराने के लिए, हर जगह उसे रुकावट का सामना करना पड़ता है। सोचिए, जब सबसे ज्यादा शिकायतें उन विभागों से आ रही हैं, जिनसे गरीब और मध्यम वर्ग का रोज का वास्ता है, तो फिर आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर कैसे बचेगा?
हम भ्रष्टाचार को केवल घूसखोरी समझकर भूल कर देते हैं। असल में यह उससे कहीं बड़ा है। जब नियमों में बदलाव केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जाता है, वह भी भ्रष्टाचार है। जब भाई-भतीजावाद के कारण योग्य व्यक्ति को नौकरी नहीं मिलती, वह भी भ्रष्टाचार है। जब सरकारी फाइल जानबूझकर लटकाई जाती है, ताकि व्यक्ति परेशान होकर पैसे देने पर मजबूर हो जाए, वह भी भ्रष्टाचार है। यह एक तरह से व्यवस्था की हत्या है और हत्या भी रोज।
सब कुछ डिजिटल हो गया है, तो भ्रष्टाचार कैसे होगा? हकीकत यह है कि डिजिटल की आड़ में भ्रष्टाचार ने नया रूप ले लिया है। पोर्टल पर फॉर्म है, लेकिन सर्वर काम नहीं कर रहा बोलकर व्यक्ति को बाहर से मदद लेने को कहा जाता है। बाहर वही दलाल बैठा है, जो पहले टेबल के नीचे पैसे लेता था। अब वह ऑनलाइन फॉर्म भरने के नाम पर पैसे लेता है। नाम बदल गया, काम वही है। इसलिए केवल कंप्यूटर लगाने से ईमानदारी नहीं आएगी। जब तक नीयत नहीं बदलेगी।
बैंक, रेलवे और आवास तथा शहरी विकास ये तीन विभाग सबसे अधिक शिकायतों वाले हैं। क्यों? क्योंकि यहां आम आदमी का सपना जुड़ा है। किसान को बैंक से कर्ज चाहिए, ताकि फसल बो सके। छात्र को शिक्षा ऋण चाहिए, ताकि पढ़ सके। मजदूर को रेलवे से टिकट चाहिए, ताकि घर जा सके। गरीब को आवास योजना में मकान चाहिए, ताकि सिर पर छत हो। जब सपनों की फाइल पर ही घूस का बोझ रख दिया जाएगा तो विकास कैसे होगा? ये विभाग अगर ईमानदार हो जाएं तो देश की आधी परेशानी खत्म हो जाएगी।
भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा असर अमीर पर नहीं, गरीब पर पड़ता है। अमीर तो पैसे देकर अपना काम करा लेता है, लेकिन गरीब के पास देने को पैसे नहीं होते, इसलिए उसका काम अटक जाता है। राशन कार्ड में नाम जुड़वाना हो, पेंशन लेनी हो, अस्पताल में बिस्तर चाहिए हो, हर जगह उसे धक्के खाने पड़ते हैं। इसी कारण गरीब और गरीब होता जाता है और अमीर के लिए सिस्टम आसान होता जाता है। यह असमानता ही विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।
छोटे भ्रष्टाचार के साथ-साथ बड़े भ्रष्टाचार पर भी नजर डालनी होगी। चुनाव में जिस तरह धन का प्रयोग बढ़ा है, उसने भी इस समस्या को खाद-पानी दिया है। जब चुनाव जीतने के लिए करोड़ों खर्च होंगे तो जीतने के बाद वसूली भी होगी। यह वसूली फिर ठेकों में कमीशन के रूप में दिखाई देती है। ठेकेदार घटिया सड़क बनाता है, क्योंकि उसे कमीशन देना है। अधिकारी आंख मूंद लेता है, क्योंकि उसे हिस्सा मिल गया है और जनता उस टूटी सड़क पर चलने को मजबूर है। यह चक्र तोड़ना जरूरी है।
हम हर बार नया कानून मांग लेते हैं, लेकिन कानून पहले से ही हैं। कमी उनके पालन की है। जरूरत इस बात की है कि सजा जल्दी और सख्त मिले। आज भ्रष्टाचार का केस दस-दस साल चलता है। तब तक आरोपी रिटायर हो जाता है या प्रमोशन पा जाता है। इससे डर खत्म हो जाता है। अगर समय-सीमा में जांच और सजा तय हो जाए तो आधा भ्रष्टाचार वैसे ही खत्म हो जाएगा। शिक्षा में हमें स्कूल में ही बच्चों को यह सिखाना होगा कि ईमानदारी कोई कमजोरी नहीं, ताकत है। जो अधिकारी ईमानदार हैं, उन्हें मंच पर सम्मान मिलना चाहिए, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि ईमानदारी का भी सम्मान है।
हम खुद भी कई बार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। लाइन में लगने से बचने के लिए सौ रुपये देना हमें आसान लगता है। ट्रैफिक पुलिस से बचने के लिए पचास रुपये देना हमें सुविधा लगती है, लेकिन यही छोटी सुविधा बड़े भ्रष्टाचार की नींव बनती है। अगर हर नागरिक यह ठान ले कि चाहे देर हो जाए, लेकिन घूस नहीं देंगे तो सिस्टम को सुधरना ही पड़ेगा।
विकास का अर्थ केवल फ्लाईओवर और मेट्रो नहीं है। विकास का अर्थ है कि आम आदमी को बिना डर और बिना घूस के उसका हक मिले। जब तक यह नहीं होगा, तब तक बड़ी-बड़ी योजनाएं कागज पर ही चमकती रहेंगी और जमीन पर भ्रष्टाचार की दीवार विकास को रोकती रहेगी।















