मुंबई, 07 सितंबर।
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक नई रिपोर्ट ने दुनिया के तटीय शहरों के सामने खड़े खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। इसमें मुंबई के साथ कोलकाता और ढाका को दक्षिण एशिया के उन प्रमुख महानगरों में शामिल किया गया है, जहां समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तटीय बाढ़ और जमीन धंसने जैसी परिस्थितियां भविष्य में विकराल रूप ले सकती हैं। यह रिपोर्ट दुनिया भर में 50 करोड़ लोगों पर ध्यान देने के साथ मानव विस्थापन, आर्थिक नुकसान और बुनियादी ढांचे पर जलवायु जोखिम का आकलन करते समय आजीविका और सामाजिक प्रभावों को भी योजनाओं में प्रमुखता देने की जरूरत बताती है।
2024 में वैश्विक समुद्र स्तर 5.9 मिलीमीटर की रिकॉर्ड दर से बढ़ा। यह दर 2014 से 2023 के बीच के औसत से भी अधिक है। यह जलवायु परिवर्तन की गति पहले के अनुमानों से कहीं तेज होने का संकेत है। ग्लेशियरों के पिघलने और समुद्र के गर्म होने से पानी का विस्तार हो रहा है और यही विस्तार तटीय शहरों के लिए खतरा बन रहा है।
मुंबई के लिए परेशानी इसलिए है, क्योंकि उसका जोखिम केवल समुद्र स्तर बढ़ने तक सीमित नहीं है। शहर के कुछ हिस्सों में जमीन धंसने (लैंड सब्सिडेंस) और समुद्री खारे पानी की घुसपैठ का खतरा भी मौजूद है। स्टॉर्म सर्ज यानी तूफानी लहरें भी शहर की स्वच्छता व्यवस्था, आवास और परिवहन ढांचे पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। पिछले दस साल में 28 बार चार घंटे में 50 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश दर्ज हुई है, जो पहले कभी नहीं होती थी। मुंबई तीन तरफ से समुद्र से घिरा है, इसलिए खतरा और भी अधिक है।
यूएन ने सरकारों को चेतावनी दी है कि दुनिया भर में करीब 50 करोड़ लोग ऐसे निचले तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, जहां नदियां समुद्र से मिलती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह आबादी जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है।
कोलकाता, ढाका और मुंबई को एक ही श्रेणी में रखा गया है। ये तीनों शहर घनी आबादी वाले हैं और समुद्र के किनारे बसे हैं। इन शहरों में बाढ़ का खतरा सबसे ज्यादा है, क्योंकि यहां ड्रेनेज सिस्टम पुराना है और तेजी से हो रहे शहरीकरण ने पानी के प्राकृतिक निकास को रोक दिया है। जब समुद्र का स्तर बढ़ेगा तो बारिश का पानी समुद्र में नहीं जा पाएगा और शहर में ही भरेगा।
अगर समुद्र का स्तर इसी गति से बढ़ता रहा तो 2050 तक मुंबई में करीब एक करोड़ चालीस लाख लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इसमें झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि वे सबसे निचले इलाकों में रहते हैं और उनके पास बचाव के साधन भी कम हैं। मछुआरा समुदाय, जो समुद्र के किनारे रहता है, उसकी आजीविका भी खतरे में पड़ जाएगी।
मुंबई में एक और खतरा जमीन धंसने का है। कई इलाकों में, जहां पहले दलदल था, वहां भराव करके इमारतें बनाई गई हैं। ऐसी जमीन धीरे-धीरे धंस रही है। जब समुद्र का स्तर बढ़ेगा और जमीन धंसेगी तो दोनों मिलकर खतरे को दोगुना कर देंगे। नवी मुंबई और वसई-विरार जैसे इलाकों में यह समस्या पहले से ही देखी जा रही है।
यूएन की रिपोर्ट सरकारों को सलाह देती है कि वे केवल बड़े बांध और दीवारें बनाने पर ध्यान न दें, बल्कि लोगों के जीवन को भी देखें। सबसे पहले तटीय क्षेत्रों के लिए नई योजना बनानी होगी, जिसमें लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की योजना हो। दूसरी बात यह कि मैंग्रोव को बचाना होगा। मैंग्रोव प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं और तूफानी लहरों को रोकते हैं। मुंबई में पिछले 20 साल में बड़ी संख्या में मैंग्रोव काटे गए हैं। उन्हें फिर से लगाना होगा।
यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिक को भी समझना होगा कि प्लास्टिक कचरा नालों में फेंकने से बाढ़ का खतरा बढ़ता है। अगर हम अपने आसपास सफाई रखेंगे और पानी के प्राकृतिक रास्तों को नहीं रोकेंगे तो नुकसान कम होगा। साथ ही बिजली और ईंधन का कम उपयोग करके हम ग्लोबल वार्मिंग को कुछ हद तक रोक सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट एक चेतावनी है, न कि भविष्यवाणी। अगर समय रहते कदम उठाए गए तो नुकसान को कम किया जा सकता है। मुंबई ने पहले भी कई आपदाओं का सामना किया है और हर बार उबरकर सामने आई है, लेकिन समुद्र के बढ़ते स्तर का संकट धीमा और स्थायी है। इससे लड़ने के लिए लंबी योजना और मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है। अगर आज नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी को एक डूबता हुआ शहर विरासत में देना पड़ेगा, जो किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।















