नई दिल्ली, 7 सितंबर।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को नई दिल्ली में रक्षा कूटनीति पर तैयार किए गए रक्षा दस्तावेज का विमोचन किया। यह दस्तावेज अगले दस वर्षों के लिए भारत की वैश्विक रक्षा साझेदारी की दिशा तय करता है। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि सुरक्षा का प्रदाता और सहयोग का केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। यह सोच भारत की विदेश नीति और रक्षा नीति के बदलते स्वरूप को दर्शाती है।
आज की दुनिया में कोई भी देश अकेले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। आतंकवाद, समुद्री डकैती, साइबर हमले और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा सामूहिक प्रयास से ही संभव है। भारत इस सच्चाई को समझता है। इसलिए वह अपने मित्र देशों के साथ रक्षा क्षेत्र में सर्वोत्तम तौर-तरीकों को साझा करने और सेनाओं के बीच आपसी तालमेल एवं परिचालन क्षमता को मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई मित्र देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यासों की संख्या बढ़ाई है। चाहे वह अमेरिका के साथ युद्ध अभ्यास हो या फ्रांस के साथ शक्ति अभ्यास या फिर आसियान देशों के साथ समुद्री अभ्यास हो, इन अभ्यासों से न केवल सेनाओं के बीच समझ बढ़ती है, बल्कि आपात स्थिति में एक साथ काम करने की क्षमता भी विकसित होती है। रक्षा दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि साझेदारी को मजबूत करने के लिए नियमित संवाद और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा।
मित्र देशों के साथ सहयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू रक्षा उत्पादन है। भारत अब मेक इन इंडिया के तहत रक्षा उपकरणों का निर्माण कर रहा है और चाहता है कि मित्र देश भी इस उत्पादन श्रृंखला का हिस्सा बनें। दस्तावेज में कहा गया है कि भारत वैश्विक रक्षा निर्माण केंद्र बनने का लक्ष्य रखता है। इससे न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, बल्कि मित्र देशों को भी किफायती और भरोसेमंद हथियार प्रणालियां मिल सकेंगी। यह सहयोग एकतरफा नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के लिए लाभकारी होगा।
भारत की रक्षा कूटनीति में हिंद-प्रशांत क्षेत्र का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखना भारत के साथ-साथ पूरे विश्व के हित में है। भारत ने इस क्षेत्र में अपने मित्र देशों जैसे जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग बढ़ाया है। समुद्री अभ्यास मालाबार इसका उदाहरण है। रक्षा दस्तावेज में इस बात को रेखांकित किया गया है कि समुद्री सुरक्षा को सक्रिय वैश्विक सहयोग से जोड़ते हुए दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जाएगी।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह दस्तावेज अगले दशक के लिए एक स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत शांति, स्थिरता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मजबूत स्तंभ बना रहे। रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए, जो इस दस्तावेज के महत्व को दर्शाता है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, रक्षा कूटनीति भारत की विदेश नीति का एक मुख्य स्तंभ है। रक्षा कूटनीति का अर्थ केवल हथियार खरीदना या बेचना नहीं है, बल्कि यह भरोसे का निर्माण है। यह दर्शाता है कि भारत एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में अपने मित्रों के साथ खड़ा है। चाहे वह मानवीय सहायता हो, आपदा राहत हो या समुद्री सुरक्षा, भारत हमेशा सहयोग के लिए तैयार रहा है।
आने वाले वर्षों में भारत का ध्यान तीन बातों पर रहेगा। पहला, रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना, दूसरा, बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग को प्रभावी बनाना और तीसरा, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के साथ मित्र देशों को जोड़ना। यह दस्तावेज भारत को वैश्विक रक्षा निर्माण और सुरक्षा सहयोग का केंद्र बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न केवल भारत की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता को भी बल मिलेगा।
मित्र देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की यह नीति केवल रक्षा सौदों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सोच है, जो भारत को विश्व में एक विश्वसनीय और मजबूत भागीदार के रूप में स्थापित करती है। यह सहयोग परस्पर सम्मान और साझा हितों पर आधारित है और यही इसे दीर्घकालिक और टिकाऊ बनाता है















