रायसेन, 7 सितंबर।
प्रदेश भर की जेलों की सुरक्षा की पोल तब खुली, जब रायसेन जिला जेल में गोलीकांड हो गया। हत्या के आरोप में बंद एक बंदी ने जेल से भागने की कोशिश में प्रहरी को देसी तमंचे से गोली मार दी। गोली प्रहरी की कमर के पिछले हिस्से में लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। यह घटना बताती है कि जेल के भीतर हथियार कैसे पहुंचा और सुरक्षा व्यवस्था कहां सो रही थी।
जुलाई में एक से 15 जुलाई तक प्रदेश भर की जेलों का सेफ्टी ऑडिट करवाया गया था। इस दौरान जेल सुरक्षा के हर पहलू की गंभीरता से जांच की गई और जेल अधीक्षकों ने मुख्यालय को शपथपत्र देकर सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त होने का भरोसा भी दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सेफ्टी ऑडिट के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई? प्रदेश में 11 केंद्रीय जेल, 41 जिला जेल, 75 उप जेल और आठ खुली जेल हैं। इन सभी में सुरक्षा का एक समान और प्रभावी पैमाना होना चाहिए।
प्रदेश की कई जिला जेलों में दीवार के बाहर से नशे की सामग्री फेंके जाने के मामले सामने आते रहे हैं। इसके बाद जेल मुख्यालय ने दीवारों के आसपास नियमित पेट्रोलिंग और तैनाती के निर्देश दिए थे। लेकिन रायसेन गोलीकांड में जेल अधिकारियों का ही कहना है कि तमंचा और कारतूस दीवार के उस पार से फेंका गया। यदि ऐसा है तो पेट्रोलिंग टीम क्या कर रही थी? और यदि हथियार जेल के भीतर से बंदी तक पहुंचा, तो भ्रष्टाचार और मिलीभगत कितनी गहरी है?
सबसे गंभीर बात यह है कि यह घटना सेफ्टी ऑडिट के करीब डेढ़ माह बाद हुई। सवाल यह है कि क्या अफसरों ने केवल फोटो खिंचवाकर रिपोर्ट भेज दी और मुख्यालय ने बिना भौतिक सत्यापन के उसे स्वीकार कर लिया? ऑडिट का उद्देश्य कागज पूरे करना नहीं, बल्कि खामियों को पहचानकर उन्हें दूर करना होना चाहिए।
रायसेन की घटना जेल प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि दीवार के बाहर से नशा और हथियार जेल के भीतर पहुंच रहे हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था पर फिर से गंभीरता से विचार करना होगा। सरकार को सेफ्टी ऑडिट की दोबारा स्वतंत्र जांच करवानी चाहिए और लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। वरना आज का तमंचा कल इससे बड़े खतरे का कारण बन सकता है।














