भोपाल, 7 सितंबर।
जब मंचों से गुरुओं के सम्मान की बात हो रही थी, तब जमीन पर सरकारी स्कूलों की हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही थी। एक तरफ एजुकेशन पोर्टल 3.0 पर सब कुछ हरा-हरा दिखाया जा रहा था, तो दूसरी तरफ गांवों में बांस-बल्लियों और पेड़ के नीचे बच्चे पढ़ने को मजबूर थे। यही कथनी और करनी का अंतर है, जो सालों से शिक्षा व्यवस्था को खोखला कर रहा है।
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर सहित प्रदेश के 840 स्कूलों से ली गई ग्राउंड रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सब व्यवस्थित है। दावा हवा-हवाई निकला। कई स्कूलों में आज भी एक शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल चल रहा है। वह पढ़ाएगा, रजिस्टर भरेगा या मध्याह्न भोजन की व्यवस्था देखेगा, यह किसी को नहीं पता। कई स्कूलों में शिक्षक पर पढ़ाई के साथ-साथ यू-डाइस, समग्र आईडी और बच्चों को घर से बुलाने तक की जिम्मेदारी है। वह सुबह हाजिरी लेता है, फिर भोजन बनवाता है, कागज पूरे करता है और अंत में समय बचा तो पढ़ा भी देता है। ऐसे में गुणवत्ता की उम्मीद कैसे की जाए? जब शिक्षक ही बाबू बन जाएगा तो शिक्षा कैसे बचेगी?
कहीं मंदिर के दालान में कक्षा लग रही है, तो कहीं पेड़ के नीचे। इंदौर के महू-मानपुर रोड पर कवच संस्था ने झोपड़पट्टी के 40 से ज्यादा बच्चों के लिए बांस-बल्लियों और ग्रीन नेट से अस्थायी स्कूल बनाया है। यह तस्वीर दो बातें कहती है। एक तो यह कि समाज में आज भी शिक्षा के लिए जज्बा है। दूसरा यह कि सरकारी सिस्टम की नाकामी को अब समाज अपने जुगाड़ से भर रहा है।
सरकार ने युक्तियुक्तकरण के नाम पर बड़ा अभियान चलाया था। कहा गया था कि जहां शिक्षक ज्यादा हैं, वहां से कम वाले स्कूलों में भेजे जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि शहरों में आज भी 20 बच्चों पर एक शिक्षक है, तो आदिवासी जिलों में 35 बच्चों पर एक शिक्षक है। सिंगरौली, झाबुआ और छतरपुर जैसे जिलों में स्थिति सबसे खराब है। इससे साफ है कि यह पूरी कवायद केवल कागजों पर हुई है।
क्यों बनता है यह अंतर? क्योंकि निगरानी का सिस्टम ही फेल है। पोर्टल पर डेटा भर दिया जाता है और ऊपर बैठा अधिकारी बिना जांच के ओके कर देता है। कोई जमीन पर जाकर नहीं देखता कि स्कूल में छत है या नहीं, बच्चे बैठे हैं या नहीं। गांव के लोगों की भागीदारी भी लगभग खत्म हो गई है। पहले पालक-शिक्षक संघ की बैठकें होती थीं, अब वह भी औपचारिकता बन गई हैं।
हम शिक्षा को आज भी खर्च मानते हैं, निवेश नहीं। इसीलिए भवन मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, शौचालय टूटे हैं, बिजली नहीं है, लेकिन प्रचार के लिए पैसा है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक स्कूल नहीं बदलेंगे।
हर जिले में पोर्टल के डेटा का हर तीन महीने में भौतिक सत्यापन हो और वह भी किसी बाहरी एजेंसी से, न कि उसी विभाग से। शिक्षक को गैर-शैक्षणिक कामों से मुक्त करना होगा, ताकि वह कक्षा पर ध्यान दे सके। स्थानीय समुदाय को जोड़ना होगा। इंदौर की तरह जो संस्थाएं अच्छा काम कर रही हैं, उन्हें प्रोत्साहित करना होगा और उनके मॉडल को सरकारी स्कूलों में अपनाना होगा।
शिक्षक दिवस केवल फूल-माला का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन है। अगर आज भी हमारे बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ेंगे और पोर्टल पर सब ओके दिखेगा, तो यह सबसे बड़ा धोखा होगा। कथनी और करनी के इस अंतर को मिटाना ही गुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। वरना हम हर साल शिक्षक दिवस मनाते रहेंगे और शिक्षा हर साल रोती रहेगी।














