रीवा, 08 सितंबर।
रीवा का संजय गांधी अस्पताल अब इलाज के लिए नहीं, बल्कि कारनामों के लिए जाना जा रहा है। डॉक्टरों ने एक जिंदा मरीज को मृत घोषित कर दिया। परिजन शव वाहन बुक करके उसे घर ले जाने लगे, तभी हाथ पकड़ा तो सांसें चल रही थीं। यह कोई मामूली चूक नहीं, बल्कि गंभीर लापरवाही है। यह घटना अकेली नहीं है। पिछले एक महीने में आधा दर्जन से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली उजागर करते हैं।
मंत्री जी के राज में स्वास्थ्य सेवाओं में इतनी तरक्की हुई है कि अब जिंदा को मुर्दा और मुर्दा को जिंदा बताया जा रहा है। इंदौर के सरकारी अस्पताल में मासूम बच्चों ने तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया। छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप ने बच्चों की जान ले ली। किसी कंपनी ने जहर बेचा और सरकारी तंत्र उसे टॉफी समझकर बांटता रहा। यह तरक्की नहीं, व्यवस्था की भयावह विफलता है।
रीवा की घटना ने सिस्टम को नंगा कर दिया। संजय गांधी अस्पताल में जच्चा-बच्चा मौत का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि नई घटना ने सबको हिला दिया। डॉक्टरों ने बिना पर्याप्त जांच के मरीज को मृत घोषित कर दिया। सोचिए, यदि परिजनों ने उसका हाथ न पकड़ा होता तो जिंदा व्यक्ति का अंतिम संस्कार हो जाता। यह उस शहर में हो रहा है, जिसे स्वास्थ्य मंत्री अपना गढ़ बताते हैं। गृह जिले में ही जब यह हाल है तो बाकी प्रदेश की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इंदौर, छिंदवाड़ा से रीवा तक मौतों की एक ही कहानी दिखाई देती है - अव्यवस्था, लापरवाही और जवाबदेही का अभाव। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में बुनियादी व्यवस्थाएं सवालों के घेरे में हैं। बिस्तर कम पड़ रहे हैं, मरीज जमीन पर इलाज कराने को मजबूर हैं, डॉक्टरों की कमी है और दवाओं को लेकर भी शिकायतें सामने आती रहती हैं। इसके बावजूद सरकारी तंत्र स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के दावे करता रहता है। हर कांड के बाद जांच के आदेश, निलंबन या तबादले की कार्रवाई होती है और कुछ समय बाद मामला शांत पड़ जाता है। सवाल यह है कि बड़ी जिम्मेदारी वाले पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही कब तय होगी?
कार्यकर्ताओं ने अस्पताल में प्रदर्शन किया और डीन-अधीक्षक के खिलाफ नारेबाजी की तो पुलिस आगे आ गई। दो घंटे तक अधीक्षक बाहर नहीं आए। कार्यकर्ताओं को अस्पताल में घुसने से रोका गया और पुलिस तथा छात्रों में झड़प भी हुई। मरीजों और उनके परिजनों की परेशानियों का समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि व्यवस्था पर उठ रहे सवालों को दबाना।
रीवा में शव घर ले जाने के लिए शव वाहन तक नहीं मिलने की शिकायतें भी गंभीर हैं। परिजनों को निजी वाहन बुक करना पड़ता है। पैसे नहीं हों तो कंधे पर शव ढोने की मजबूरी बन जाती है। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यवस्था के लिए शर्मनाक है।
स्वास्थ्य मंत्री को अब आत्ममंथन करना चाहिए। केवल एसी कमरों में बैठक करने से स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं सुधरेगी। जमीन पर उतरकर अस्पतालों की वास्तविक स्थिति देखनी होगी। बिना सिफारिश इलाज कराकर और मरीजों के बीच समय बिताकर ही व्यवस्था की सच्चाई समझी जा सकती है। जब जिंदा व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया जाए, बच्चों की मौत जहरीली दवा से हो और अस्पतालों में मासूम तड़पते रहें, तो समझना होगा कि व्यवस्था गंभीर संकट में है। अब केवल जांच नहीं, ठोस जवाबदेही चाहिए और इसकी शुरुआत सबसे ऊपर से होनी चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे पर विचार करना चाहिए, क्योंकि मंत्री के शहर में ही स्वास्थ्य व्यवस्था की अर्थी उठती दिखाई दे रही है।














