नई दिल्ली, 08 सितंबर।
हिमालय के ग्लेशियरों पर अब सिर्फ बढ़ते तापमान का खतरा नहीं है। हवा में मौजूद कालिख और धूल भी बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रही है। गाड़ियों, कोयला बिजलीघरों, फैक्ट्रियों, ईंट भट्ठों, घरों के चूल्हों और जंगलों व खेतों में लगने वाली आग से निकलने वाले कण हवा के साथ ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचते हैं और ग्लेशियरों की सफेद सतह पर जम जाते हैं। बर्फ पर जमी कालिख सूरज की गर्मी ज्यादा सोखती है। इससे बर्फ जल्दी पिघलने लगती है। इससे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के साथ प्रदूषण का यह असर ग्लेशियरों को कमजोर और अस्थिर कर सकता है।
सफेद बर्फ सूरज की रोशनी को वापस लौटा देती है। इसे विज्ञान में अल्बेडो प्रभाव कहा जाता है। लेकिन जब बर्फ पर काली धूल जम जाती है तो वही बर्फ काली सतह की तरह गर्मी सोखने लगती है। एक छोटा सा काला कण अपने आसपास की कई गुना बर्फ पिघला सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे पूरे ग्लेशियर को अंदर से खोखला कर सकती है।
यह प्रदूषण केवल हिमालय के आसपास का नहीं है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में जलने वाली पराली का धुआं, दिल्ली जैसे शहरों का वाहन प्रदूषण और उत्तर प्रदेश-बिहार के ईंट भट्ठों की कालिख हवा के साथ हजारों किलोमीटर का सफर करके हिमालय तक पहुंच सकती है। सर्दियों में जब हवा का प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर होता है तो यह प्रदूषण सीधे पहाड़ों पर जमा हो सकता है।
नेपाल इसका चिंताजनक उदाहरण है। यहां हाल में ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक बाढ़ आई और भारी नुकसान हुआ। इस घटना की सटीक वजह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों पर जमा प्रदूषण ऐसे हादसों का जोखिम बढ़ा सकते हैं। नेपाल में आई यह ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड की घटना बताती है कि भविष्य में क्या हो सकता है। जब ग्लेशियर के अंदर पानी की झील बनती है और कालिख के कारण तेजी से पिघलने से वह झील फट जाती है तो नीचे बसे गांव और शहर तबाह हो सकते हैं।
भारत के लिए यह खतरा और भी बड़ा है। गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियां हिमालय के ग्लेशियरों से ही निकलती हैं। अगर ग्लेशियर तेजी से पिघले तो पहले बाढ़ आएगी और बाद में पानी की कमी हो जाएगी। उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की चमोली आपदा ने यही दिखाया था कि ग्लेशियरों का अस्थिर होना कितना खतरनाक हो सकता है।
यह समस्या केवल भारत और नेपाल की नहीं, बल्कि वैश्विक है। हिमालय को एशिया का वाटर टावर कहा जाता है। यहां से दस बड़ी नदियां निकलती हैं, जिन पर दो सौ करोड़ से ज्यादा लोग निर्भर हैं। अगर हिमालय के ग्लेशियर कमजोर हुए तो भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश सभी देशों में जल संकट पैदा हो सकता है। इसलिए इसे केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि सुरक्षा का मुद्दा समझना होगा।
समाधान दो स्तर पर करना होगा। पहला, वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा। दूसरा, स्थानीय स्तर पर काले कार्बन यानी ब्लैक कार्बन को रोकना होगा। इसके लिए ईंट भट्ठों में नई तकनीक लानी होगी, घरों में स्वच्छ चूल्हे देने होंगे, पराली जलाने की जगह उसका उपयोग करना होगा और डीजल वाहनों पर रोक लगानी होगी। हिमालय को बचाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र बनाना होगा, जिसमें भारत, नेपाल, भूटान और चीन मिलकर ग्लेशियरों पर जमा हो रही कालिख की मात्रा को मापें और साझा करें। वैज्ञानिकों को अधिक शोध के लिए संसाधन देने होंगे, ताकि सटीक आंकड़े मिल सकें।
हिमालय अब केवल बर्फ का पहाड़ नहीं, बल्कि एक नाजुक प्रयोगशाला बन गया है, जहां इंसान की हर गलती का हिसाब दिख रहा है। कालिख का एक कण, जो दिल्ली में किसी ट्रक से निकला, वह सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर हिमालय की बर्फ पिघला सकता है। यह बताता है कि दुनिया कितनी जुड़ी हुई है। अगर हमने समय रहते अपनी आदतें नहीं बदलीं तो आने वाली पीढ़ी को न तो गंगा में पानी मिलेगा और न ही हिमालय पर बर्फ। यह समय केवल रिपोर्ट पढ़ने का नहीं, बल्कि जागने का है, क्योंकि हिमालय रो रहा है और उसकी आवाज बाढ़ और सूखे के रूप में हमारे दरवाजे तक आ रही है।















