भोपाल, 8 सितंबर।
एलएनसीटी विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित परीक्षा संचालन और मूल्यांकन विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का सोमवार को समापन हुआ। कार्यशाला का आयोजन मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 7 और 8 सितंबर को किया गया। आयोजन एलएनसीटी समूह के सचिव डॉ. अनुपम चौकसे के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।
कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार मौजूद रहे। दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना और वंदेमातरम् के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। अतिथियों का शॉल और श्रीफल भेंटकर स्वागत किया गया। विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. डॉ. नरेन्द्र कुमार थापक ने भारतीय शिक्षा पद्धति की समृद्ध विरासत का उल्लेख करते हुए आधुनिक परीक्षा और मूल्यांकन व्यवस्था को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि भारतीय मूल्यों और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से परीक्षा प्रणाली को अधिक व्यावहारिक, प्रासंगिक और प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने परीक्षा को केवल मूल्यांकन की प्रक्रिया तक सीमित न रखते हुए उसे नई दिशा देने की जरूरत पर जोर दिया।
प्रो. खेमसिंह डेहरिया ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के व्यावहारिक उपयोगों पर विचार रखे। उच्च शिक्षा आयुक्त प्रबल सिपाहा और मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के निदेशक अशोक कडेल ने नीतिगत सुधारों तथा पारदर्शी मूल्यांकन प्रक्रियाओं के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. अतुल कोठारी ने भारतीय मूल्यों और आधुनिक तकनीक के मेल से परीक्षा व्यवस्था को अधिक उपयोगी बनाने पर जोर दिया। उद्घाटन सत्र का आभार डॉ. दिनेश दवे ने व्यक्त किया।
पहले दिन के तकनीकी सत्र में महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. रमेश चन्द्र भारद्वाज ने भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा, परीक्षा और मूल्यांकन के दार्शनिक आधार पर व्याख्यान दिया। राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष प्रो. चंद्र चारु त्रिपाठी ने सतत एवं समग्र मूल्यांकन, कौशल आधारित और प्रयोगात्मक परीक्षाओं के मूल्यांकन पर अपने विचार रखे। सत्र की अध्यक्षता प्रो. रविन्द्र कन्हेरे ने की।
कार्यशाला में परीक्षा एवं मूल्यांकन की अवधारणा, गुरु-शिष्य परंपरा, दक्षता आधारित मूल्यांकन, प्रश्न-पत्र निर्माण, भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित मूल्यांकन उपकरण, डिजिटल माध्यमों से परीक्षा संचालन तथा निष्पक्ष और विद्यार्थी-केंद्रित मूल्यांकन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
पहले दिन के अंतिम चरण में डॉ. अनु श्रीवास्तव के प्रभार में शोधपत्र प्रस्तुतीकरण सत्र आयोजित हुआ, जिसमें आचार्यों और शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। दूसरे दिन प्रवेश और विद्यार्थी चयन में मूल्यांकन की भूमिका, डिजिटल परीक्षा व्यवस्था, मूल्यांकन के विभिन्न आयाम, समग्र व्यक्तित्व विकास, चरित्र निर्माण, गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थी मूल्यांकन और विकसित भारत-2047 के लिए भारतीय परीक्षा मूल्यांकन मॉडल पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए।
देशभर के विश्वविद्यालयों से परीक्षा नियंत्रक, सहायक परीक्षा नियंत्रक, शोधकर्ता, शिक्षाविद् और विषय विशेषज्ञ कार्यशाला में शामिल हुए। आयोजन का मूल संदेश परीक्षा को केवल परिणाम तक सीमित न रखकर व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम बनाने पर केंद्रित रहा।















