भोपाल, 08 सितंबर।
राजधानी भोपाल में गणेश मंदिर से आंबेडकर तक बना फ्लाईओवर सिर्फ कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि सरकारी इंजीनियरिंग के फेल होने का स्मारक बनता दिखाई दे रहा है। उद्घाटन के 15 दिन के भीतर गड्ढे, सर्विस रोड पर जलभराव, रिटेनिंग वॉल से पानी का रिसाव और जगह-जगह दरारें सामने आ गईं। यह किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल है। हाईकोर्ट ने जब आड़े हाथों लिया तो विभाग की नींद खुली।
इस पूरे मामले का सबसे शातिर पहलू यह है कि फ्लाईओवर खराब हुआ तो पीडब्ल्यूडी ने 4.69 करोड़ रुपये से मरम्मत का टेंडर करने की तैयारी कर ली। यानी गलती ठेकेदार करे और पैसा जनता का लगे। हाईकोर्ट ने पूछा कि जब केंद्र के लिए पैसे नहीं हैं तो मुफ्त में होने वाले काम के लिए 4.69 करोड़ रुपये क्यों? सवाल सरकारी जेब से ज्यादा नीयत पर था। विभाग ठेकेदार की जिम्मेदारी खुद उठाने को तैयार क्यों था, इसका जवाब भी मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब पीडब्ल्यूडी कह रहा है कि मरम्मत और रखरखाव का पूरा खर्च ठेका कंपनी उठाएगी। 20 प्रतिशत क्षतिपूर्ति राशि भी वसूली जाएगी। यानी जो काम अनुबंध की शर्तों के अनुसार ठेकेदार को करना था, उसके लिए अदालत की फटकार जरूरी पड़ी। सवाल यह है कि यदि जनहित याचिका नहीं लगती और हाईकोर्ट हस्तक्षेप नहीं करता तो क्या 4.69 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से निकल जाते?
फ्लाईओवर का निर्माण 31 दिसंबर 2024 को पूरा हुआ था और 2026 तक ठेके की गारंटी थी। फिर इतनी जल्दी सड़क और निर्माण में खामियां कैसे आईं? निर्माण के साथ निगरानी और गुणवत्ता जांच की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। केवल ठेकेदार पर पेनाल्टी लगाकर विभाग खुद पाक-साफ नहीं बन सकता।
यह मामला अपवाद नहीं होना चाहिए, बल्कि सबक बनना चाहिए। हर बड़े निर्माण की स्वतंत्र गुणवत्ता जांच, जवाबदेही और गारंटी अवधि में ठेकेदार से अनिवार्य मरम्मत सुनिश्चित हो। जनता के पैसे से घटिया काम और फिर जनता के पैसे से उसकी मरम्मत - यह व्यवस्था अब नहीं चलनी चाहिए।














