भोपाल, 9 सितंबर।
भोपाल में जीआईएसएस के दौरान रेतीघाट पर लगाया गया फाउंटेन अब घोटाले का फव्वारा बन गया है। नगर निगम की जांच समिति ने गड़बड़ी तो मान ली, लेकिन किसने की और इससे कितना नुकसान हुआ, यह नहीं बताया। यानी चोरी पकड़ी गई, पर चोर गायब कर दिया गया।
संचालनालय ने पकड़ी खामी। संचालनालय ने जब तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगा तो निगम बगले झांकने लगा। उप संचालक एकता अग्रवाल ने साफ लिखा कि रिपोर्ट में जिम्मेदार अधिकारियों के नाम नहीं हैं और आर्थिक क्षति का जिक्र तक नहीं है। 19 अगस्त को निगम आयुक्त को पत्र भेजकर खामियां गिनाई गईं, लेकिन आज तक पूरा जवाब नहीं आया।
निगम एक अप्रैल को बनी समिति की आड़ में कागजी खानापूर्ति करता नजर आ रहा है। व्यक्तिगत वर्जन के लिए अधिकृत नहीं हूं, कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा जा रहा है। आरोप है कि घटिया फाउंटेन ऊंचे दाम पर खरीदा गया और जल्दबाजी में उसका भुगतान भी कर दिया गया। आज फाउंटेन बंद है और जनता का पैसा डूब गया।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि फाउंटेन क्यों बंद हुआ। सवाल यह है कि खरीद में गुणवत्ता की जांच किसने की, कीमत तय करने की प्रक्रिया क्या थी और भुगतान की मंजूरी किसने दी? यदि जांच समिति ने गड़बड़ी मानी है तो जिम्मेदारी तय करने से क्यों बचा जा रहा है?
यह केवल एक फाउंटेन का मामला नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल है। जब जांच में गड़बड़ी सामने आ चुकी है तो दोषी इंजीनियर, ठेकेदार और भुगतान करने वाले अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। कार्रवाई में देरी से संदेह और गहरा होता है। जनता के पैसे से होने वाले आयोजनों में यदि जिम्मेदारी तय नहीं होगी तो हर बड़े आयोजन में भ्रष्टाचार का फव्वारा इसी तरह बहता रहेगा।














