चेन्नई, 9 सितंबर।
मद्रास उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि ईसाई महिला हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की मांग नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति पी.टी. आशा और न्यायमूर्ति एन. माला की पीठ ने एस. रानी बनाम संपत मामले में यह निर्णय सुनाया।
मामले में महिला का दावा था कि 10 जुलाई 2008 को विल्लुपुरम के पास एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से उसका विवाह हुआ था। उसने आरोप लगाया कि बाद में पति ने उसके साथ क्रूरता की और सास-ननद ने मारपीट की। महिला के अनुसार उसे ससुराल से भी निकाल दिया गया था।
महिला ने पति के साथ दोबारा रहने के लिए परिवार न्यायालय, विल्लुपुरम में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत याचिका दायर की थी। पति ने विवाह से ही इन्कार कर दिया। उसका कहना था कि महिला ईसाई धर्म का पालन करती है, इसलिए उसके मामले में हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं हो सकता।
परिवार न्यायालय ने महिला की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने इस फैसले को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद परिवार न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया।
पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम केवल उन लोगों पर लागू होता है, जो कानून में निर्धारित हिंदू की श्रेणी में आते हैं। अधिनियम की धारा 2 में इसके दायरे को स्पष्ट किया गया है। याचिकाकर्ता स्वयं को आदि द्रविड़ ईसाई बताती है, इसलिए वह इस कानून के तहत हिंदू नहीं मानी जा सकती।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह होने का दावा करने से संबंधित विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में नहीं आ जाता। इसलिए महिला को इस अधिनियम के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की राहत नहीं दी जा सकती।
उच्च न्यायालय ने महिला की याचिका खारिज कर दी। फैसले का निष्कर्ष यह है कि यदि विवाह में एक पक्ष ईसाई और दूसरा हिंदू है तो ऐसे विवाह से जुड़े अधिकारों का मामला हिंदू विवाह अधिनियम के तहत नहीं चलाया जा सकता।
ऐसे मामलों में विवाह और उससे जुड़े अधिकारों के लिए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत कानूनी रास्ता अपनाना होगा।














