ग्वालियर, 9 सितंबर।
ग्वालियर में विदेश मंत्रालय की पासपोर्ट बनाने की प्रक्रिया में बांग्लादेशियों के सेंध लगाने का मामला सामने आया है। डबरा के सिमरिया टेकरी की बौद्ध विहार कॉलोनी के एक ही पते पर फर्जी दस्तावेजों से बीस पासपोर्ट जारी कर दिए गए। सभी पासपोर्ट बांग्लादेशियों के नाम पर जारी किए गए हैं। इस खुलासे के बाद लोगों का सत्यापन करने वाली डबरा पुलिस संदेह के घेरे में है। मास्टरमाइंड रियाल का कहना है कि वर्षों पहले ये लोग बांग्लादेश छोड़कर आए और अलग-अलग शहरों में रह रहे हैं। उसने ऐसे लोगों के पासपोर्ट बनवाने के लिए आधार कार्ड, पैन कार्ड और दूसरे दस्तावेज तैयार कराए। एसटीएफ ने मास्टरमाइंड समेत दो लोगों को दबोचा है और 40 से ज्यादा फर्जी पासपोर्ट का नेटवर्क उजागर हुआ है।
फर्जी पते पर असली पासपोर्ट जारी होना अपने आप में गंभीर सवाल है। एक ही पते पर बीस पासपोर्ट कैसे बन गए? क्या पुलिस सत्यापन हुआ? क्या डाक विभाग ने जांच की? क्या पासपोर्ट सेवा केंद्र पर दस्तावेजों की गहन जांच नहीं हुई? यदि हुई तो फर्जी आधार पर असली पासपोर्ट कैसे जारी हो गया? यह केवल लापरवाही नहीं है, बल्कि सिस्टम में मिलीभगत की आशंका भी पैदा करता है। आधार कार्ड बनना, पैन कार्ड बनना और फिर उसी आधार पर पासपोर्ट बनना एक पूरी चेन है, जो बिना स्थानीय मदद के संभव नहीं है।
इस मामले को केवल फर्जी पासपोर्ट का मामला समझना भूल होगी। यह अंतरराष्ट्रीय गैंग का मामला है और देश की आंतरिक सुरक्षा में सीधी सेंध है। बांग्लादेशी नागरिक भारतीय पासपोर्ट पर विदेश जा सकते हैं, किसी भी देश में भारत के नाम पर अपराध कर सकते हैं और बदनामी भारत की होगी। साथ ही यह भी खतरा है कि ऐसे लोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। बीस पासपोर्ट का मतलब है कि बीस लोग भारतीय बनकर सिस्टम में घुस गए हैं। 40 से ज्यादा फर्जी पासपोर्ट का खुलासा बताता है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है।
डबरा के सिमरिया टेकरी की बौद्ध विहार कॉलोनी का पता सिर्फ एक उदाहरण हो सकता है। ऐसे कई पते हो सकते हैं, जहां फर्जी तरीके से लोगों को भारतीय दिखाया जा रहा हो। मास्टरमाइंड ने स्वीकार किया है कि वह ऐसे लोगों को लाता था और उनके दस्तावेज बनवाता था। सवाल यह है कि आधार केंद्र पर सत्यापन कैसे हुआ? वोटर आइडी कैसे बनी? यदि एक ही जगह बीस लोग रहते हैं तो स्थानीय लोगों को पता क्यों नहीं चला? या पता था तो चुप क्यों रहे? यह सब मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
पासपोर्ट बनने में पुलिस सत्यापन की अहम भूमिका होती है। पुलिस को मौके पर जाकर जांच करनी होती है कि व्यक्ति उस पते पर रहता है या नहीं और उसका आचरण कैसा है। लेकिन यहां तो पुलिस ने भी हरी झंडी दे दी या फिर रिपोर्ट ही नहीं देखी गई। डबरा पुलिस अब संदेह के घेरे में है। क्या सत्यापन करने वाले ने मौके पर जाकर देखा भी था या थाने में बैठकर रिपोर्ट लिख दी गई? यदि पुलिस ने सही काम किया होता तो यह फर्जीवाड़ा पहले ही पकड़ में आ जाता।
एसटीएफ ने दो लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है और पूछताछ जारी है, लेकिन यह केवल शुरुआत है। इस पूरे रैकेट को जड़ से उखाड़ना होगा। 40 से ज्यादा पासपोर्ट का मतलब है कि कई एजेंट, दलाल और सरकारी कर्मचारी इस खेल में शामिल हो सकते हैं। केवल दो लोगों को पकड़ने से काम नहीं चलेगा। हर पासपोर्ट के पीछे किसने दस्तावेज बनाए, किसने सत्यापन किया और किसने पासपोर्ट जारी किया, इसकी जांच होनी चाहिए। साथ ही उन बीस बांग्लादेशियों को भी खोजना होगा, जिनके नाम पर पासपोर्ट बने हैं। वे कहां हैं, क्या वे भारत में हैं या विदेश जा चुके हैं, इसका पता लगाना जरूरी है।
यह घटना ग्वालियर की है, लेकिन ऐसा नेटवर्क देशभर में हो सकता है। कई सीमावर्ती जिलों में ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं। आधार को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। फर्जी आधार कैसे बन जाता है और फिर उसी फर्जी आधार पर पासपोर्ट बनना बताता है कि हमारी पहचान प्रणाली में अभी भी खामी है। विदेश मंत्रालय को अपनी प्रक्रिया और सख्त करनी होगी। पुलिस सत्यापन को भौतिक के साथ-साथ डिजिटल भी करना होगा और एक ही पते पर कई पासपोर्ट जारी होने पर सिस्टम को खुद अलर्ट जारी करना चाहिए।
पासपोर्ट केवल विदेश जाने का दस्तावेज नहीं है, यह भारतीय पहचान का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यदि वही फर्जी तरीके से बनने लगे तो देश की सुरक्षा खतरे में है। सरकार को इस मामले में कठोर कार्रवाई करनी होगी। दोषी चाहे कोई भी हो - पुलिस हो, पासपोर्ट अधिकारी हो या आधार केंद्र संचालक - सभी पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी इस तरह देश की सुरक्षा में सेंध लगाने की हिम्मत न कर सके। सिस्टम ने मास्टरमाइंड समेत दो लोगों को दबोचा है, लेकिन असली जीत तब होगी, जब इस पूरे अंतरराष्ट्रीय गैंग का पर्दाफाश होगा और हर फर्जी पासपोर्ट रद्द होगा।














