भोपाल, 9 सितंबर।
भोपाल। प्रदेश के नौ में से छह टाइगर रिजर्व इन दिनों शिकार, बाघों के बीच आपसी संघर्ष और बाघ-इंसान के बीच द्वंद्व से जूझ रहे हैं। शिकारी शिकार करने में कामयाब हो रहे हैं, बाघ आपस में लड़कर जान गंवा रहे हैं, जबकि रिजर्व से बाहर निकलने वाले बाघों के साथ इंसानों का आमना-सामना हो रहा है। नतीजा यह है कि बीते दस साल में आपसी संघर्ष के कारण 50 से ज्यादा बाघों की जान जा चुकी है और 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, जबकि हजारों पालतू मवेशी मारे जा चुके हैं। आने वाले दिनों में ये घटनाएं बढ़ सकती हैं। असल में रिजर्वों में जगह कम पड़ रही है और बाघों की संख्या बढ़ रही है।
प्रत्येक रिजर्व के लिए दस वर्षीय टाइगर कंजर्वेशन प्लान (टीसीएस) बनाया जाता है। इसमें संबंधित रिजर्व की आगामी जरूरत, संभावित चुनौतियों और उनके निदान की योजना भी होती है। जब से यह लागू किया जाता है, उसके तहत चरणवार काम होते हैं। इस पर बड़ी राशि खर्च की जाती है। हर दस वर्ष में नया टीसीएस बनाया जाता है। यह प्लान वैज्ञानिक आधार पर बनता है, लेकिन कई बार जमीन पर इसका पालन नहीं हो पाता।
रिजर्वों के आसपास बाघों की जान करंट लगाकर या जहर देकर ली जा रही है, जो बताता है कि रिजर्वों के आसपास वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए अभी बहुत काम करने की जरूरत है। आपसी संघर्ष की सबसे ज्यादा स्थिति बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बन रही है और बाघों की जान भी जा रही है। इसका मतलब साफ है कि रिजर्व में बाघों की संख्या ज्यादा है और उन्हें भरपेट शिकार नहीं मिल रहा। इनकी संख्या के संतुलन और शिकार की कमी को पूरा करने जैसे बड़े विषयों पर पर्याप्त काम नहीं हुआ है। जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ रही है, वैसे ही संघर्ष भी बढ़ रहा है।
रिजर्वों में बाघ तेजी से बढ़े हैं और शिकारी गिरोह भी सक्रिय हैं। शिकारियों से निपटने के लिए पर्याप्त मैनपावर नहीं है। सभी रिजर्वों के पास 20 से 30 साल पहले का मैनपावर है, उसमें भी कई पद खाली हैं। शिकारी गिरोह आधुनिक संसाधनों से लैस हैं, जबकि वन अमला खाली है। रिजर्वों में संदिग्ध प्वाइंटों पर न तो वॉच टावर हैं और न ही गश्त के लिए आधुनिक संसाधनों से लैस वाहन। नाममात्र बाघों को कॉलर आईडी लगाई गई है। रातापानी, माधव और दुर्गावती टाइगर रिजर्व के लिए अब तक अलग से एक्शन प्लान बनाने की तैयारी है। वन्यप्राणी बोर्ड की बैठक में इस पर चर्चा हो सकती है।
पहले एक बाघ को 20 से 25 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र चाहिए था, अब उसी क्षेत्र में दो से तीन बाघ रहने को मजबूर हैं। इससे टेरिटरी की लड़ाई बढ़ गई है। बाघ अपने क्षेत्र के लिए दूसरे बाघ को मार देता है या घायल कर देता है। कई बार शावकों की मौत भी इसी संघर्ष में हो जाती है। रिजर्व के अंदर शिकार की कमी भी एक बड़ा कारण है। चीतल, सांभर जैसे जानवरों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ी, जिस अनुपात में बाघ बढ़े हैं। इसलिए बाघ गांव की ओर जाने को मजबूर हो रहे हैं।
रिजर्व से सटे गांवों में रहने वाले लोगों का जीवन अब असुरक्षित हो गया है। रात में बाघ गांव में घुस जाता है और मवेशियों को उठा ले जाता है। कई बार लोग खेत पर जाते हैं तो अचानक बाघ से सामना हो जाता है। पालतू मवेशियों की मौत से ग्रामीणों में गुस्सा है और वे कई बार करंट लगाकर या जहर देकर बदला लेते हैं। यह सिलसिला थम नहीं रहा है। वन विभाग मुआवजा तो देता है, लेकिन वह नाकाफी है और समय पर नहीं मिलता।
पिछले दस साल में 50 से अधिक बाघ आपसी संघर्ष और मानव-द्वंद्व में मारे गए हैं, वहीं 200 से अधिक लोग बाघ के हमले में जान गंवा चुके हैं। हजारों मवेशी मारे गए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है। मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट कहा जाता है, लेकिन यदि बाघ ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो यह तमगा भी खतरे में पड़ जाएगा।
रिजर्व के आसपास बफर क्षेत्र में शिकार बढ़ाने और पानी की व्यवस्था करने से बाघ अंदर ही रहेंगे। दूसरा समाधान है कॉरिडोर को सुरक्षित करना। बाघ एक रिजर्व से दूसरे रिजर्व में जाते हैं और उनके रास्ते में गांव तथा सड़कें आ गई हैं। उन कॉरिडोर को अतिक्रमण मुक्त करना होगा। तीसरा समाधान है मैनपावर बढ़ाना। 20 साल पुराने स्टाफ से आज के खतरे का सामना नहीं किया जा सकता। आधुनिक हथियार, ड्रोन, कैमरा और प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत है। चौथा समाधान है ग्रामीणों को जागरूक करना और मुआवजा प्रक्रिया को तेज करना। यदि ग्रामीणों को तुरंत और उचित मुआवजा मिलेगा तो वे बाघ को मारने की नहीं सोचेंगे।
रातापानी, माधव और दुर्गावती को नया टाइगर रिजर्व बनाया गया है। इससे बाघों को नया घर मिलेगा और पुराने रिजर्वों पर दबाव कम होगा। लेकिन केवल नया रिजर्व घोषित करने से काम नहीं चलेगा। वहां भी प्रबंधन मजबूत करना होगा। नए रिजर्व में शिकार, पानी और सुरक्षा की पूरी व्यवस्था करनी होगी, तभी बाघ वहां टिक पाएंगे। वरना वे फिर पुराने रिजर्वों की ओर लौट आएंगे।
बाघ और इंसान दोनों को जीने का हक है। जंगल बाघ का घर है और गांव इंसान का। लेकिन जब जंगल छोटा होगा तो टकराव बढ़ेगा। सरकार को टाइगर कंजर्वेशन प्लान को केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर लागू करना होगा। वैज्ञानिक तरीके से बाघों की संख्या का प्रबंधन, शिकार का प्रबंधन और मानव-बाघ संघर्ष को कम करने के उपाय करने होंगे। तभी मध्यप्रदेश का टाइगर स्टेट का गौरव बचा रहेगा और आने वाले दस साल में 50 बाघों और 200 लोगों की मौत की कहानी दोहराई नहीं जाएगी। सहअस्तित्व के बिना न जंगल बचेगा, न गांव।















